Swami Avimukteshwaranand Saraswati: जब संन्यास मौन नहीं, प्रतिरोध बन जाता है…. (शाश्वत तिवारी)
Swami Avimukteshwaranand Saraswati: समकालीन भारत में धर्म की भूमिका लगातार बहस के केंद्र में है। कहीं वह राजनीति का औज़ार बन रहा है, कहीं बाज़ार की वस्तु, तो कहीं केवल भावनात्मक नारों तक सीमित। ऐसे समय में कुछ संत ऐसे भी हैं जो धर्म को विवेक, मर्यादा और शास्त्र की कसौटी पर परखते हुए सत्ता और समाज, दोनों से प्रश्न करते हैं।
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शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती:
संन्यास, संघर्ष और सनातन चेतना की समकालीन आवाज़।
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ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इसी श्रेणी के संन्यासी हैं। वे न केवल एक पीठाधीश्वर हैं, बल्कि सनातन परंपरा के मुखर, निर्भीक और असुविधाजनक स्वर भी हैं।
उनका जीवन इस धारणा को चुनौती देता है कि संन्यास का अर्थ केवल संसार से विरक्ति है। उनके लिए संन्यास का अर्थ है, सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस, चाहे वह सत्ता के विरुद्ध ही क्यों न हो।
पूर्वाश्रम: संस्कारों से चेतना तक
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पूर्वाश्रम नाम और सांसारिक पहचान सार्वजनिक विमर्श से दूर रखी गई है। यह स्वयं शंकराचार्य परंपरा का संकेत है, जहाँ व्यक्ति गौण और विचार प्रधान होता है।
उनका जन्म उत्तर भारत के एक परंपरागत, वैदिक संस्कारों से युक्त ब्राह्मण परिवार में हुआ। बाल्यकाल से ही उनमें शास्त्रों के प्रति जिज्ञासा,
सामाजिक अन्याय पर प्रश्न और आत्मानुशासन
के लक्षण दिखाई देने लगे थे।
औपचारिक शिक्षा के दौरान उन्होंने आधुनिक समाज की जटिलताओं, विसंगतियों और सत्ता-संरचनाओं को निकट से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके वैचारिक संघर्ष की भूमि बना।
संन्यास का निर्णय पलायन नहीं, प्रतिज्ञा
युवावस्था में उन्होंने सांसारिक जीवन के आकर्षणों को त्यागकर संन्यास मार्ग अपनाया। यह निर्णय किसी भावुक क्षण का परिणाम नहीं था, बल्कि गहन वैचारिक मंथन और आत्मबोध से उपजा था।
संन्यास उनके लिए पलायन नहीं, बल्कि जीवनभर सत्य के प्रति उत्तरदायी रहने की प्रतिज्ञा था।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रमुख शिष्यों में रहे। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 20वीं–21वीं सदी के सबसे प्रभावशाली शंकराचार्यों में गिने जाते हैं, जो ज्योतिर्मठ (उत्तर) और शारदा पीठ द्वारका (पश्चिम) के शंकराचार्य थे।
गुरु सान्निध्य में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को, अद्वैत वेदांत, शंकराचार्य परंपरा, धर्म और सत्ता के संबंध
तथा सार्वजनिक उत्तरदायित्व का गहन प्रशिक्षण मिला।
“अविमुक्तेश्वरानंद”, यह नाम स्वयं उनके जीवन-दर्शन को प्रकट करता है।
अर्थात: जो मोक्ष-पथ से कभी विचलित न हो, जो सत्य से समझौता न करे। उनका जीवन वास्तव में इस नाम का विस्तार प्रतीत होता है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की पहचान एक शास्त्रसम्मत और तर्कशील आचार्य के रूप में है। उन्होंने वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता, स्मृतियाँ और धर्मशास्त्र का विधिवत अध्ययन किया। उनकी विशेषता यह है कि वे ग्रंथों को केवल उद्धरण के लिए नहीं, बल्कि समकालीन संदर्भ में जीवंत अर्थ देने के लिए पढ़ते हैं।
ज्योतिर्मठ पीठ और उत्तराधिकार का प्रश्न
2022 में ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के महाप्रयाण के बाद ज्योतिर्मठ पीठ के उत्तराधिकार का प्रश्न राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का दावा है कि
उन्हें गुरु द्वारा विधिवत उत्तराधिकारी घोषित किया गया। शास्त्रीय परंपरा और संन्यासी समाज का बड़ा समर्थन उन्हें प्राप्त है। हालाँकि, इस विषय में मतभेद, दावे-प्रतिदावे और न्यायिक प्रक्रियाएँ भी सामने आईं। स्वयं शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार कहते हैं,
“शंकराचार्य पद सत्ता नहीं, सेवा और दायित्व है। इसका निर्णय राजनीति नहीं, परंपरा करती है।”
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती उन संतों में नहीं हैं जो सत्ता के निकट रहकर मौन साध लेते हैं। वे
सरकारों से प्रश्न करते हैं, धार्मिक संस्थाओं के बाज़ारीकरण की आलोचना करते हैं और धर्म के राजनीतिक उपयोग पर खुलकर बोलते हैं।
मुख्य मुद्दे जिन पर वे मुखर रहे, गौहत्या और गो-संरक्षण। मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण, सनातन धर्म की गलत व्याख्या, धर्म के नाम पर पाखंड और दिखावा। उनकी भाषा उग्र नहीं, बल्कि तथ्यपूर्ण, संयत और शास्त्रसम्मत होती है। वे अद्वैत वेदांत को केवल आत्मिक मुक्ति का दर्शन नहीं मानते, बल्कि सामाजिक विवेक, नैतिक साहस और सार्वजनिक उत्तरदायित्व का आधार मानते हैं।
उनका मानना है, “ब्रह्म सत्य है, लेकिन समाज से आँख मूँद लेना अद्वैत नहीं, पलायन है।”
उनकी मुखरता उन्हें विवादों में भी लाती है।
उन्हें अत्यधिक राजनीतिक या विवादप्रिय कहते हैं। लेकिन उनके समर्थकों का तर्क है कि, जो संत सत्ता को असहज नहीं करता, वह परंपरा को निर्जीव बना देता है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती युवाओं से बार-बार कहते हैं, “धर्म विरासत नहीं, विवेक है। और विवेक प्रश्न करता है।” यही संदेश उन्हें परंपरागत संतों से अलग खड़ा करता है।
आज जब धर्म या तो चुनावी मंचों पर सिमट गया है या टीवी बहसों की चीख-पुकार में, तब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जैसे संत याद दिलाते हैं कि, धर्म सत्ता का सहायक नहीं, उसका नैतिक अनुशासक है।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का जीवन यह सिखाता है कि सनातन परंपरा केवल अतीत नहीं, जीवंत चेतना है। वे सत्ता को सहज नहीं लगते, बाज़ार को लाभकारी नहीं, और पाखंड को स्वीकार्य नहीं, और शायद यही कारण है कि वे आज के भारत में अत्यंत आवश्यक हैं।
संन्यास जब विवेक बन जाए, तब वह समाज की सबसे बड़ी ताक़त बनता है, और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती उसी ताक़त का प्रतिनिधित्व करते हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)



