Crime News: 5 साल के बेटे का बयान बना आधार, 23 साल जेल में रहा पिता — इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और 3 बच्चों की हत्या के मामले में किया बरी
पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में उम्रकैद काट रहे व्यक्ति को सबूतों के अभाव में मिली राहत
Crime News: करीब दो दशक से ज्यादा समय तक जेल में रहने के बाद एक व्यक्ति को आखिरकार न्याय मिला। पत्नी और तीन मासूम बच्चों की हत्या के आरोप में सजा काट रहे इस शख्स को Allahabad High Court ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
यह मामला न सिर्फ एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2003 का है। आरोप था कि एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी और तीन बच्चों की बेरहमी से हत्या कर दी। पुलिस ने जांच के बाद उसे गिरफ्तार किया और निचली अदालत ने उसे दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी।
मामले में सबसे अहम गवाह उसका पांच साल का बेटा था, जो घटना के समय घर में मौजूद बताया गया। बच्चे के बयान के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया।
23 साल बाद बदला बयान
समय बीतता गया। आरोपी जेल में रहा और उसने फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान अब 28 साल का हो चुका वही बेटा अदालत में पेश हुआ।
उसने कहा कि बचपन में दिया गया उसका बयान दबाव में था। उसका दावा था कि उसे सिखाया गया था कि क्या कहना है, और यदि वह वैसा बयान नहीं देता तो उसे डराया-धमकाया जाता।
यह खुलासा मामले का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।
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हाईकोर्ट ने क्या कहा?
Allahabad High Court ने पूरे मामले के साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा की। अदालत ने पाया कि:
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अभियोजन पक्ष ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर सका।
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मेडिकल और अन्य साक्ष्यों में कई विरोधाभास थे।
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केवल एक नाबालिग गवाह के बयान पर सजा देना न्यायसंगत नहीं था।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मामला न्याय व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है। आखिरकार आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
न्याय, लेकिन बहुत देर से
23 साल जेल में बिताने के बाद मिली यह राहत अपने साथ कई सवाल भी छोड़ती है। जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा सलाखों के पीछे गुजारा, क्या उसे खोया हुआ समय वापस मिल सकता है?
यह फैसला गवाहों की विश्वसनीयता, जांच की गुणवत्ता और न्यायिक प्रक्रिया की गति पर गंभीर चर्चा की मांग करता है।
एक पांच साल के बच्चे का बयान, जो बाद में बदल गया, किसी की पूरी जिंदगी पर भारी पड़ गया। दो दशक से ज्यादा समय बाद अदालत ने कहा — सबूत पर्याप्त नहीं थे।
यह मामला बताता है कि न्याय मिल सकता है, लेकिन देर से मिला न्याय भी कई बार अधूरा महसूस होता है।
Written By: Anushri Yadav



