LLM की बड़ी सीमाएं
हसाबिस के अनुसार, आज के AI मॉडल टेक्स्ट, इमेज और वीडियो जैसे डेटा को प्रोसेस तो कर सकते हैं, लेकिन वे असली दुनिया को समझने में कमजोर हैं। खास तौर पर तीन बड़ी कमियां हैं:
पहली, लंबे समय की योजना बनाने की क्षमता।
दूसरी, लगातार सीखते रहने की योग्यता यानी कंटीन्युअल लर्निंग।
तीसरी, गहरे स्तर पर तर्क और कारण–परिणाम को समझने की शक्ति।
उनका कहना है कि जब तक AI को फिजिक्स और कॉज़ेलिटी यानी कारण और नतीजे की समझ नहीं होगी, तब तक वह वैज्ञानिक प्रयोगों की सही नकल नहीं कर सकता।
‘वर्ल्ड मॉडल’ क्या हैं?
डेमिस हसाबिस ‘वर्ल्ड मॉडल’ की वकालत करते हैं। ये ऐसे AI सिस्टम होंगे जो दुनिया के भौतिक नियमों, जैविक प्रक्रियाओं और सामाजिक व्यवहारों को समझ सकें। इससे AI अपने अंदर ही सिमुलेशन चला पाएगा, ठीक वैसे जैसे वैज्ञानिक लैब में प्रयोग करते हैं।
उनका मानना है कि बिना एक सटीक ‘दुनिया की समझ’ के AI न तो सही भविष्यवाणी कर सकता है और न ही नई दवाओं या तकनीकों की खोज में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
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लेकुन से मतभेद भी
इस मुद्दे पर डेमिस हसाबिस और मशहूर AI वैज्ञानिक यान लेकुन की सोच कुछ जगहों पर मिलती है और कुछ पर अलग है। दोनों ‘वर्ल्ड मॉडल’ को जरूरी मानते हैं, लेकिन जनरल इंटेलिजेंस को लेकर उनकी राय अलग है।
यान लेकुन कहते हैं कि इंसानी बुद्धिमत्ता असल में स्पेशलाइज्ड है, पूरी तरह जनरल नहीं। वहीं हसाबिस का कहना है कि इंसानी दिमाग ब्रह्मांड की सबसे जटिल और जनरल सिस्टम में से एक है।
दवा खोज में AI की भूमिका
हसाबिस के अनुसार, अगर AI को सही मायनों में वैज्ञानिक की तरह सोचने लायक बना दिया जाए, तो वह नई दवाओं की खोज में समय और लागत दोनों को काफी कम कर सकता है। लेकिन इसके लिए मौजूदा LLM से आगे जाकर ज्यादा समझदार और वास्तविक दुनिया से जुड़े मॉडल बनाने होंगे।
निष्कर्ष
डेमिस हसाबिस की बातों से साफ है कि AI का भविष्य सिर्फ बड़े डेटा या तेज कंप्यूटिंग पर नहीं, बल्कि ‘दुनिया को समझने’ की क्षमता पर निर्भर करता है। ‘वर्ल्ड मॉडल’ इसी दिशा में अगला बड़ा कदम हो सकता है।
यानी, AI में असली क्रांति तब आएगी जब वह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि हकीकत को समझना शुरू करेगा।