National News: मिडिल ईस्ट संकट के बीच पीएम मोदी का इजरायल दौरा: कूटनीति, रणनीति और संतुलन की परीक्षा

25 फरवरी से शुरू होगी यात्रा; रक्षा सहयोग, क्षेत्रीय अस्थिरता और भारत की संतुलित विदेश नीति पर टिकी वैश्विक नजर

 National News: मिडिल ईस्ट एक बार फिर तनाव के दौर से गुजर रहा है। इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष, सीरिया और इराक की अस्थिरता, ईरान को लेकर बढ़ती बयानबाज़ी और अमेरिका की संभावित सैन्य चेतावनियों ने पूरे क्षेत्र को संवेदनशील बना दिया है। ऐसे समय में भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi का 25 फरवरी से प्रस्तावित इजरायल दौरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास महत्व रखता है।

प्रधानमंत्री के रूप में यह उनका दूसरा इजरायल दौरा होगा। 2017 में उन्होंने पहली बार इजरायल की ऐतिहासिक यात्रा की थी, जिससे दोनों देशों के संबंधों में नई ऊर्जा आई थी। अब मौजूदा हालात में उनका यह दौरा केवल एक द्विपक्षीय मुलाकात नहीं, बल्कि भारत की व्यापक विदेश नीति का संकेत माना जा रहा है।

क्यों अहम है यह समय?

मिडिल ईस्ट में इस समय हालात नाजुक हैं। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच तनाव बना हुआ है, वहीं ईरान को लेकर पश्चिमी देशों की बयानबाज़ी ने आशंकाएं बढ़ाई हैं। अमेरिकी राजनीति में भी ईरान के खिलाफ कड़े रुख की चर्चा तेज है। ऐसे माहौल में किसी भी बड़े देश के नेता का इजरायल जाना सिर्फ औपचारिकता नहीं माना जाता, बल्कि एक रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है।

भारत ने अब तक संतुलित नीति अपनाई है। उसने इजरायल के साथ अपने मजबूत रक्षा और तकनीकी संबंध बनाए रखे हैं, तो दूसरी ओर खाड़ी देशों—जैसे संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब—के साथ आर्थिक और ऊर्जा सहयोग भी मजबूत किया है। यही संतुलन इस यात्रा को विशेष बनाता है।

भारत-इजरायल संबंधों की पृष्ठभूमि

भारत और इजरायल के बीच आधिकारिक राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए थे। इसके बाद से दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा। मिसाइल सिस्टम, ड्रोन तकनीक, साइबर सुरक्षा और खुफिया साझेदारी जैसे क्षेत्रों में इजरायल भारत का अहम साझेदार है।

2017 में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद संबंधों में और मजबूती आई। उस दौरान कृषि तकनीक, जल प्रबंधन और स्टार्टअप सहयोग के क्षेत्र में भी कई पहल हुईं। इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu भी भारत आ चुके हैं और दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत समीकरणों को भी मजबूत माना जाता है।

हालांकि, 2025 में नेतन्याहू की प्रस्तावित भारत यात्रा कई कारणों से टल गई थी। ऐसे में मोदी का इजरायल जाना यह संकेत देता है कि दोनों देश अपने संबंधों को प्राथमिकता देते हैं और किसी भी अस्थिर परिस्थिति के बावजूद संवाद जारी रखना चाहते हैं।

‘शांति सेतु’ की भूमिका?

भारत ने वैश्विक मंच पर खुद को एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत ने सीधे किसी पक्ष का समर्थन करने के बजाय संवाद और कूटनीति की बात की थी। मिडिल ईस्ट के संदर्भ में भी भारत की नीति यही रही है कि वह सभी पक्षों से संवाद बनाए रखे।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत औपचारिक मध्यस्थ की भूमिका भले न निभाए, लेकिन वह एक “शांति सेतु” के रूप में संवाद के रास्ते खुले रखने में योगदान दे सकता है। भारत के इजरायल, खाड़ी देशों और यहां तक कि ईरान के साथ भी संबंध हैं। यह संतुलन उसे एक विशिष्ट स्थिति में खड़ा करता है।

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रक्षा और तकनीक का आयाम

भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं के लिहाज से इजरायल एक महत्वपूर्ण साझेदार है। सीमा निगरानी, आतंकवाद-रोधी तकनीक और आधुनिक हथियार प्रणालियों में सहयोग भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूत करता है। ऐसे समय में जब क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ रही है, इन परियोजनाओं की निरंतरता रणनीतिक रूप से अहम है।

इसके अलावा, कृषि और जल प्रबंधन में इजरायल की विशेषज्ञता भारत के लिए उपयोगी रही है। दोनों देशों के बीच नवाचार और स्टार्टअप सहयोग भी बढ़ रहा है। यह यात्रा इन क्षेत्रों में नए समझौतों या प्रगति की दिशा तय कर सकती है।

संतुलन की चुनौती

हालांकि, इस दौरे के साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी इजरायल यात्रा को किसी एक धड़े के समर्थन के रूप में न देखा जाए। खाड़ी देशों के साथ भारत के गहरे आर्थिक संबंध हैं और वहां बड़ी भारतीय आबादी काम करती है। इसलिए कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।

नई दिल्ली हाल ही में अरब विदेश मंत्रियों की मेजबानी कर चुकी है। ऐसे में इजरायल दौरा इस बात का संकेत हो सकता है कि भारत अपनी क्षेत्रीय नीति में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है—न किसी से दूरी, न किसी के साथ अंध समर्थन।

आगे क्या?

प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक भू-राजनीति तेजी से बदल रही है। भारत खुद को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। मिडिल ईस्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सक्रिय और संतुलित कूटनीति भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत कर सकती है।

अब नजर इस बात पर होगी कि इस यात्रा से कौन से ठोस समझौते सामने आते हैं और क्या भारत क्षेत्रीय स्थिरता में कोई रचनात्मक भूमिका निभा पाता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह दौरा केवल द्विपक्षीय मुलाकात नहीं, बल्कि भारत की व्यापक रणनीतिक सोच का हिस्सा है—जहां कूटनीति, सुरक्षा और संतुलन, तीनों साथ-साथ चलते हैं।

Written By: Anushri Yadaav

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