Pratapgarh News-रामानुज आश्रम में धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुजदास ने दीक्षा और गुरु की योग्यता पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आजकल समाज में गुरु बनने की होड़ बढ़ गई है, ऐसे में शास्त्रों के अनुसार सही गुरु की पहचान करना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि दीक्षा लेने से पहले गुरु की परीक्षा करना अनिवार्य है। कुलार्णव तंत्र के अनुसार, बिना गुरु की परीक्षा किए दीक्षा लेने वाला व्यक्ति और उसका गुरु दोनों पतन को प्राप्त होते हैं। इसलिए गुरु के ज्ञान, आचरण और साधना को परखना जरूरी है।
इसी प्रकार गुरु गीता में उल्लेख है कि मंत्र का मूल गुरु का वचन होता है, इसलिए गुरु को मंत्र और साधना का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। शिष्य को यह अधिकार है कि वह गुरु से मंत्र, जप विधि और सिद्धि के विषय में प्रश्न करे।
धर्माचार्य ने शिव पुराण का हवाला देते हुए कहा कि जो व्यक्ति स्वयं साधना में सिद्ध नहीं है, वह दीक्षा देने का अधिकारी नहीं है। केवल सिद्ध गुरु ही शिष्य को सही मार्ग दिखा सकता है।
उन्होंने आगे बताया कि बिना अधिकार के दिया गया मंत्र शिष्य के लिए हानिकारक हो सकता है, जैसा कि तांत्रिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। ऐसे गुरु को अयोग्य माना गया है।
सही गुरु की पहचान के लिए आवश्यक गुण:
- मंत्र की सिद्धि
- शुद्ध आचरण
- लोभ और दिखावे से दूर
- शिष्य के कल्याण की भावना
- गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ाव
निष्कर्ष:
धर्माचार्य ने स्पष्ट किया कि बिना परखे गुरु से दीक्षा लेना उचित नहीं है। साथ ही, उन्होंने स्वयं को इन शास्त्रीय मानकों के अनुरूप पूर्ण न मानते हुए दीक्षा न देने का निर्णय बताया। उन्होंने समाज से अपील की कि गुरु का चयन सोच-समझकर करें, ताकि जीवन, परलोक और पूर्वजों का कल्याण सुनिश्चित हो सके।
रिपोर्ट: उमेश पाण्डेय, जिला संवाददाता
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