सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के बहाने छिड़ी नई बहस : आस्था, इतिहास या बीजेपी का राजनीतिक संदेश?
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को लेकर नई बहस तेज़। आस्था और इतिहास के बीच क्या बीजेपी का राजनीतिक संदेश छिपा है? जानिए इस आयोजन के राजनीतिक और सामाजिक मायने -
New Delhi. गुजरात का सोमनाथ मंदिर हिंदू धार्मिक मान्यताओं में विशेष स्थान रखता है। इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है और यह सदियों से आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक रहा है। इन दिनों सोमनाथ मंदिर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। यहां 8 से 11 जनवरी तक आयोजित चार दिवसीय ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी ने इस आयोजन को देशभर में चर्चा का विषय बना दिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पर्व जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के 1,000 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया है। सरकार का कहना है कि यह उत्सव किसी विनाश की याद नहीं, बल्कि आस्था, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और पुनर्निर्माण की भावना का उत्सव है। चार दिनों तक सोमनाथ को आध्यात्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और राष्ट्रीय स्मृति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
हालांकि, इस ‘भव्य’ आयोजन को लेकर राजनीतिक संदेशों पर भी सवाल उठने लगे हैं। कई राजनीतिक विश्लेषक इसे भारतीय राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव और बीजेपी की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोमनाथ का भारतीय राजनीति में हमेशा से प्रतीकात्मक महत्व रहा है। 1990 के दशक की शुरुआत में लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक निकली रथ यात्रा को भारतीय राजनीति का एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस यात्रा ने बीजेपी को राष्ट्रीय राजनीति में नई पहचान दिलाई और हिंदू राष्ट्रवाद को एक संगठित राजनीतिक विचारधारा के रूप में स्थापित किया।
दिसंबर 1989 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने पहली बार अपने घोषणापत्र में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल किया था। इसका असर यह हुआ कि 1984 में केवल दो सीटें जीतने वाली पार्टी 1989 में 85 सीटों तक पहुंच गई। विश्लेषकों के अनुसार, यही वह दौर था, जब हिंदू राष्ट्रवाद एक प्रभावशाली राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने लगा।
राजनीतिक निहितार्थों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
आडवाणी की रथ यात्रा के करीब 35 साल बाद, अब जब देश में बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है, तो ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ को उसी राजनीतिक यात्रा की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोमनाथ से जुड़ी कोई भी घटना हिंदू समाज पर त्वरित और गहरा प्रभाव डालती है। ऐसे समय में, जब देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव और गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव होने वाले हैं, इस आयोजन के राजनीतिक निहितार्थों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
आलोचकों का कहना है कि इस आयोजन के ज़रिए मुस्लिम आक्रमणों और हिंदू प्रतिरोध की कथा को नए सिरे से प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे भावनात्मक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही यह नैरेटिव भी दोहराया जा रहा है कि आज़ादी के बाद तत्कालीन नेतृत्व, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू, मंदिर पुनर्निर्माण के विरोधी थे – जिसे बीजेपी अपने राजनीतिक विमर्श में बार-बार उठाती रही है।
वहीं, बीजेपी नेताओं ने इन आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का कहना है कि यह आयोजन पूरी तरह धार्मिक और सांस्कृतिक है। उनका तर्क है कि प्रधानमंत्री मोदी सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट से जुड़े रहे हैं और मंदिर परिसर व आसपास के विकास में उनका अहम योगदान रहा है, इसलिए इस पर्व को राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं है।
गुजरात में बीजेपी की मजबूत स्थिति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गुजरात में बीजेपी की स्थिति मज़बूत है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अब पार्टी के सामने शासन, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और शहरी समस्याओं जैसे मुद्दे अधिक अहम होंगे। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्वीकार करते हैं कि विपक्ष की कमजोरी के चलते फिलहाल इन चुनौतियों का बीजेपी पर कोई बड़ा असर नहीं दिख रहा।
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ऐसे में ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ को आस्था, इतिहास और राजनीति – तीनों के संगम के रूप में देखा जा रहा है, जिसने एक बार फिर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है।



