लेखा परीक्षा निदेशालय पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, ऑडिट के नाम पर कर्मचारियों का उत्पीड़न और उगाही
लेखा परीक्षा निदेशालय पर भ्रष्टाचार, कर्मचारियों के उत्पीड़न और ऑडिट के नाम पर उगाही के गंभीर आरोप। विधानसभा समिति के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई नहीं।
लखनऊ। सरकारी धन के सदुपयोग और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी निभाने वाला सहकारी एवं पंचायत लेखा परीक्षा निदेशालय खुद ही गंभीर आरोपों के घेरे में आ गया है। वित्त विभाग के अंतर्गत कार्यरत इस निदेशालय के अधिकारी संवर्ग और शासन स्तर पर तैनात एक विशेष सचिव पर कर्मचारियों के उत्पीड़न, धन उगाही और नियमों के खुले उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं।
सेंटर फॉर एक्शन अगेन्स्ट यूपी ऑडिट करप्शन के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव ने शासन को दी गई शिकायत में कहा है कि निदेशालय का उद्देश्य सहकारी एवं पंचायती राज संस्थाओं की लेखा परीक्षा कर भ्रष्टाचार उजागर करना है, लेकिन कुछ अधिकारियों ने इसे अधीनस्थ कर्मचारियों पर दबाव और अवैध वसूली का जरिया बना लिया है।
विधानसभा समिति के निर्देश ठंडे बस्ते में
शिकायत के अनुसार, लेखा परीक्षा कर्मचारियों पर तथ्यहीन आरोप लगाकर निलंबन और अनुशासनिक कार्यवाही शुरू की जाती है और बाद में कथित रूप से धन लेन-देन के जरिए आरोपों से मुक्त किया जाता है। इसे एक सुनियोजित व्यवस्था की तरह संचालित किए जाने का आरोप है।
शासन के लेखा परीक्षा अनुभाग में तैनात विशेष सचिव जयशंकर दुबे पर भी निदेशालय के भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने के आरोप लगाए गए हैं। कहा गया है कि जिलों और मंडलों में तैनात उपनिदेशक एवं जिला लेखा परीक्षा अधिकारी उनके इशारे पर कर्मचारियों पर अनुचित दबाव बनाते हैं और घूस वसूली के उद्देश्य से अनुशासनिक कार्रवाई की संस्तुति करते हैं।
कई मामलों में पीड़ित कर्मचारियों को न्याय के लिए उच्च न्यायालय का सहारा लेना पड़ा। कानपुर देहात में तैनात ज्येष्ठ लेखा परीक्षक ललित कुमार और गाजियाबाद के गणेश कुमार शुक्ल के निलंबन आदेशों को हाईकोर्ट ने दुर्भावनापूर्ण मानते हुए निरस्त कर दिया। बाद की विभागीय जांच में भी आरोप निराधार पाए गए और दोनों कर्मचारियों को दोषमुक्त किया गया।
जांच रिपोर्ट दबाई गई, दोषी अधिकारी बचे
शिकायत में गौतमबुद्ध नगर का मामला भी प्रमुखता से उठाया गया है, जहां सभी ज्येष्ठ लेखा परीक्षकों और एक सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी के खिलाफ एक साथ अनुशासनिक कार्यवाही शुरू कर दी गई। महीनों तक आरोप पत्र जारी नहीं किए गए और इस दौरान वेतन वृद्धि रोककर कर्मचारियों का मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न किया गया।
इसके अलावा, ऑडिट रिपोर्ट की समीक्षा प्रक्रिया को भी दबाव और भ्रष्टाचार का साधन बनाए जाने का आरोप है। परंपरागत रूप से 5 से 10 प्रतिशत रिपोर्ट की समीक्षा के बजाय बिना किसी स्पष्ट नियम के 100 प्रतिशत रिपोर्ट मंगाकर कथित समीक्षा कराई गई, जिसका उद्देश्य गुणवत्ता सुधार नहीं बल्कि कर्मचारियों में त्रुटियां खोजकर उन्हें दंडित करना बताया गया है।
विधानसभा समिति के निर्देशों की अनदेखी
शिकायत में यह भी उल्लेख है कि विधानसभा समिति ने लेखा परीक्षा निदेशालय में भ्रष्टाचार प्रकरण की जांच और वर्तमान में गाजियाबाद में तैनात जिला लेखा परीक्षा अधिकारी निधि शर्मा पर अनुशासनिक कार्रवाई के सख्त निर्देश दिए थे, लेकिन उन पर अमल नहीं हुआ।
पूर्व निदेशक पद्म जंग निलंबित किए गए, लेकिन नए निदेशक जयशंकर दुबे ने भी जांच रिपोर्ट की सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया। उपनिदेशक की जांच में नियम उल्लंघन सिद्ध होने के बावजूद निधि शर्मा पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और आरोपों के बावजूद उन्हें गृह जिले में ही तैनाती दे दी गई, जिससे लीपापोती के आरोप और गहराते जा रहे हैं।
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शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।



