Supreme Court News : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित फैसला पलटा, कहा- यौन अपराध मामलों में संवेदनशीलता जरूरी

Supreme Court News : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित फैसले को पलट दिया, जिसमें नाबालिग से छेड़छाड़ को बलात्कार के प्रयास नहीं माना गया था। कोर्ट ने यौन अपराध मामलों में कानूनी तर्क के साथ संवेदनशीलता पर जोर दिया।

Supreme Court News : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया है कि यौन अपराध से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण केवल तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं रह सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानूनी तर्क के साथ सहानुभूति और संवेदनशीलता भी अनिवार्य है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारी शामिल थे, ने 10 फरवरी 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष से असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि 11 वर्षीय बच्ची के साथ कथित कृत्य बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि केवल तैयारी भर है।

क्या था मामला?

मामले में आरोप था कि दो आरोपियों ने 11 वर्षीय बच्ची के स्तन पकड़े, उसका पाजामा का नाड़ा तोड़ा और उसे पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश की। राहगीरों के हस्तक्षेप से बच्ची को बचाया गया।

ट्रायल कोर्ट ने प्रथम दृष्टया अपराध को यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 (बलात्कार का प्रयास) के तहत विचारणीय माना था।

हालांकि, हाई कोर्ट ने आरोपों को आईपीसी की धारा 354-बी और पॉक्सो अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) तक सीमित कर दिया। हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने कहा था कि घटनाक्रम से बलात्कार के स्पष्ट इरादे का प्रमाण नहीं मिलता।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि न्यायालय पीड़ितों की विशेष कमजोरियों के प्रति असंवेदनशील बने रहते हैं तो “पूर्ण न्याय” संभव नहीं है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यौन अपराध के मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को सख्त तकनीकी व्याख्या से आगे बढ़कर पीड़ितों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए।

दिशानिर्देशों पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल नए दिशानिर्देश जारी करने से इनकार किया, लेकिन यह माना कि न्यायपालिका में संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए ठोस कदम जरूरी हैं। अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (भोपाल) से विशेषज्ञ समिति गठित करने को कहा है, जो यौन अपराध और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को मानवीय और प्रभावी बनाने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार करेगी।

समिति को तीन महीने के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तावित दिशानिर्देश सरल भाषा में हों और भारत की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए आम लोगों के लिए आसानी से समझने योग्य बनाए जाएं।

न्याय में सहानुभूति का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया केवल विधिक तकनीक नहीं, बल्कि करुणा, मानवता और समझ का भी प्रतिबिंब होनी चाहिए। अदालत ने माना कि न्यायाधीशों के दृष्टिकोण और अदालती प्रक्रियाओं में अंतर्निहित संवेदनशीलता को विकसित करना समय की आवश्यकता है।

यह फैसला न केवल एक विशेष मामले तक सीमित है, बल्कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के न्यायिक मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

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