Supreme Court Maintenance Judgment: पत्नी के अफेयर के सबूत मिले तो रुक सकता है मेंटेनेंस, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
92 वीडियो और अन्य साक्ष्यों वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केवल आरोप नहीं, ठोस सबूत जरूरी
Supreme Court Maintenance Judgment: सुप्रीम कोर्ट ने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी पति द्वारा पत्नी पर व्यभिचार (एडल्टरी) का आरोप लगाया जाता है और उसके समर्थन में प्रथम दृष्टया ठोस एवं विश्वसनीय सबूत पेश किए जाते हैं, तो ऐसी स्थिति में पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण (इंटरिम मेंटेनेंस) देने से पहले अदालत को उस आरोप पर विचार करना होगा। यदि शुरुआती स्तर पर आरोप सही प्रतीत होते हैं, तो अंतरिम गुजारा-भत्ता रोका जा सकता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अंतिम निर्णय आने तक पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण मिलता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा दृष्टिकोण कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) के अनुसार यदि पत्नी व्यभिचार में लिप्त पाई जाती है, बिना उचित कारण पति के साथ रहने से इनकार करती है या दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हैं, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होती। इसलिए यदि पति इस धारा के तहत आवेदन देकर प्रथम दृष्टया अपने आरोपों को साबित कर देता है, तो अदालत अंतरिम मेंटेनेंस पर भी रोक लगा सकती है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आरोप लगाने से किसी महिला का अधिकार समाप्त नहीं हो जाएगा। अदालत ने कहा कि पति को ऐसे ठोस, विश्वसनीय और प्रथम दृष्टया स्वीकार्य साक्ष्य पेश करने होंगे, जिनसे आरोपों की पुष्टि होती हो। बिना पर्याप्त सबूत के केवल आरोपों के आधार पर भरण-पोषण रोका नहीं जा सकता।
इस मामले में पति ने अदालत के सामने पत्नी के कथित संबंधों से जुड़े 92 वीडियो, तस्वीरें और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत किए थे। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि संभव है ये सामग्री किसी निजी जासूस (प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर) की मदद से जुटाई गई हो। इसी के साथ अदालत ने निजी जांच एजेंसियों के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो दंपति की शादी 7 जुलाई 2014 को हुई थी। कुछ वर्षों बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गए। पत्नी ने पति के खिलाफ विभिन्न आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायतें दर्ज कराईं और वर्ष 2020 में अपने बच्चे तथा सामान के साथ ससुराल छोड़ दिया। इसके बाद उसने उदयपुर की अदालत में अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।
इसके जवाब में पति ने CrPC की धारा 125(4) के तहत आवेदन दायर कर दावा किया कि पत्नी व्यभिचारपूर्ण संबंधों में है, इसलिए वह किसी भी प्रकार के भरण-पोषण की पात्र नहीं है। ट्रायल कोर्ट और बाद में राजस्थान हाई कोर्ट ने पति की दलीलों को स्वीकार नहीं किया, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि अदालतें व्यभिचार से जुड़े प्रश्नों पर केवल अंतिम सुनवाई के समय ही विचार करेंगी, तो धारा 125(4) का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए जहां प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों, वहां अदालत अंतरिम भरण-पोषण पर भी प्रारंभिक स्तर पर निर्णय ले सकती है।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। हालांकि अदालत ने साफ कर दिया कि हर मामले का निर्णय उसके तथ्यों और प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों के आधार पर ही होगा। केवल संदेह या आरोप के आधार पर किसी महिला के भरण-पोषण के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।



