बुंदेलखंड की भू-धरोहर बनेगी विकास का आधार, वैज्ञानिक अध्ययन में 20 स्थलों की पहचान

बुंदेलखंड में 20 महत्वपूर्ण भू-धरोहर स्थलों की पहचान। वैज्ञानिक अध्ययन में जियो-टूरिज्म के जरिए रोजगार और विकास की बड़ी संभावना जताई गई।

बुंदेलखंड। अक्सर सूखा और जल संकट के लिए चर्चा में रहने वाला बुंदेलखंड अब अपनी करोड़ों वर्ष पुरानी भू-धरोहर के कारण वैज्ञानिक और विकासात्मक दृष्टि से केंद्र में आ गया है। डी.एस.एन. (पी.जी.) कॉलेज, उन्नाव के भूगोल विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन में बुंदेलखंड क्षेत्र के 20 महत्वपूर्ण भू-धरोहर स्थलों की पहचान और मूल्यांकन किया गया है।

इस शोध में जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, फील्ड सर्वे और बहु-मापदंडीय विश्लेषण पद्धति का उपयोग किया गया। अध्ययन के अनुसार बुंदेलखंड क्षेत्र प्राचीन “बुंदेलखंड क्रेटॉन” का हिस्सा है, जहां आर्कियन युग की ग्रेनाइट चट्टानें और विंध्यन शैलसमूह पाए जाते हैं। यह क्षेत्र लगभग 70,000 वर्ग किलोमीटर में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला है।

डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, भू-धरोहर वे प्राकृतिक स्थल हैं जो पृथ्वी के विकास, भूगर्भीय संरचना, जीवाश्म और स्थलरूपों का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि भू-धरोहर केवल चट्टानें नहीं, बल्कि धरती के करोड़ों वर्षों के इतिहास का जीवंत अभिलेख हैं। इनका महत्व वैज्ञानिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और आर्थिक चारों स्तरों पर है।

अध्ययन में जिन स्थलों को विशेष महत्व दिया गया है, उनमें जानकी कुंड (लगभग 1.6 अरब वर्ष पुराने स्ट्रोमैटोलाइट जीवाश्म), कामदगिरि (ग्रेनाइट और विंध्यन शैलों का संपर्क क्षेत्र), रनेह कैन्यन (केन नदी द्वारा निर्मित ग्रेनाइट घाटी), गुप्त गोदावरी गुफाएँ (प्राकृतिक गुफा संरचनाएँ), मझगवां हीरा खदान (भारत की सक्रिय हीरा खदान) , देवगढ़ एवं बृहस्पति कुंड (भू-पुरातात्विक महत्व के स्थल) शामिल हैं।

जियो-टूरिज्म से रोजगार की संभावना

शोध में सुझाव दिया गया है कि यदि इन स्थलों का वैज्ञानिक संरक्षण और योजनाबद्ध विकास किया जाए, तो जियो-टूरिज्म के माध्यम से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित हो सकते हैं। इसके लिए व्याख्या केंद्र, सूचना पट्ट, प्रशिक्षित “जियो-गाइड” और नियंत्रित पर्यटन व्यवस्था विकसित करने की सिफारिश की गई है।

संरक्षण में चुनौतियाँ

अध्ययन में यह भी पाया गया कि भू-धरोहर स्थलों के संरक्षण में जागरूकता की कमी, अवैज्ञानिक निर्माण, खनन गतिविधियों का दबाव, विभागीय समन्वय का अभाव और कानूनी संरक्षण की कमी जैसी समस्याएँ सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों की राय

भारत सरकार के पूर्व उपमहानिदेशक, डॉ. सतीश त्रिपाठी (भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग) ने कहा कि बुंदेलखंड क्षेत्र भारतीय भूगर्भीय इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि इन स्थलों को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित कर जियो-टूरिज्म से जोड़ा जाए, तो यह क्षेत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखंड की भू-धरोहर केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य के सतत विकास का आधार बन सकती है। इसके लिए वैज्ञानिक संरक्षण, नीति समर्थन और स्थानीय सहभागिता आवश्यक है।

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