India Semiconductor Mission : ‘तीन सेमीकंडक्टर प्लांट शुरू, 9 और कतार में’, PM मोदी के ‘चिप्स-मिनरल्स’ मिशन का क्या है पूरा रोडमैप?

India Semiconductor Mission : PM मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर भारत के सेमीकंडक्टर मिशन और Critical Minerals पर जोर दिया। सैनंद में 3 प्लांट उत्पादन कर रहे हैं, जबकि 9 और परियोजनाएं पाइपलाइन में हैं।

India Semiconductor Mission : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों को भारत की आत्मनिर्भरता और रणनीतिक क्षमता से जोड़ते हुए बड़ा ऐलान किया। पीएम मोदी ने कहा कि देश में तीन सेमीकंडक्टर प्लांट उत्पादन शुरू कर चुके हैं और उनके बनाए चिप्स का निर्यात भी किया जा रहा है। इसके अलावा अगले कुछ वर्षों में 5 से 8 और सेमीकंडक्टर प्लांट शुरू होने की उम्मीद है।

हालांकि, भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा अभी शुरुआती चरण में है। मौजूदा तीन प्लांट मुख्य रूप से चिप्स की असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग (OSAT/ATMP) से जुड़े हैं, जबकि वास्तविक चिप फैब्रिकेशन और अत्याधुनिक चिप निर्माण की बड़ी चुनौती अभी आगे है।

गुजरात के सैनंद में तीन प्लांट से उत्पादन

प्रधानमंत्री जिन तीन प्लांट का जिक्र कर रहे थे, वे गुजरात के सैनंद में स्थित हैं। इनमें Micron Technology, Kaynes Semicon और CG Power की सुविधाएं शामिल हैं।

Micron का करीब 2.75 अरब डॉलर का प्लांट DRAM और NAND मेमोरी चिप्स की पैकेजिंग और टेस्टिंग करता है। कंपनी ने यहां से इस साल की शुरुआत में शिपमेंट शुरू किया।

Kaynes Semicon का प्लांट 31 मार्च से व्यावसायिक उत्पादन में आ गया और इसकी क्षमता को बढ़ाकर प्रतिदिन करीब 63 लाख चिप्स तक ले जाने की योजना है।

वहीं CG Power की जापान की Renesas और थाईलैंड की Stars Microelectronics के साथ संयुक्त परियोजना ने 4 जुलाई से व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया।

ये प्लांट चिप बनाते हैं या सिर्फ पैकेजिंग करते हैं?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। इन तीनों इकाइयों में कच्चे सिलिकॉन से ट्रांजिस्टर बनाकर चिप तैयार नहीं की जाती। ये मुख्य रूप से OSAT यानी Outsourced Semiconductor Assembly and Test के तहत काम करती हैं।

इस प्रक्रिया में पहले से तैयार सिलिकॉन वेफर को काटा जाता है, उसकी वायरिंग और टेस्टिंग की जाती है और फिर उसे पैकेज करके इस्तेमाल योग्य चिप के रूप में तैयार किया जाता है।

चिप फैब्रिकेशन इससे कहीं अधिक जटिल और पूंजी-गहन प्रक्रिया है, जिसमें सिलिकॉन वेफर पर ट्रांजिस्टर बनाए जाते हैं।

9 और परियोजनाएं पाइपलाइन में

India Semiconductor Mission के आंकड़ों के अनुसार, पहले चरण में कुल 12 परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें से तीन व्यावसायिक उत्पादन तक पहुंच चुकी हैं, जबकि 9 परियोजनाएं अभी निर्माण या विकास के अलग-अलग चरणों में हैं।

इनमें गुजरात के धोलेरा में Tata Electronics की वेफर फैब्रिकेशन परियोजना सबसे महत्वपूर्ण है। यह भारत की पहली वास्तविक सेमीकंडक्टर फैब परियोजना मानी जा रही है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, इस फैब से पहला चिप दिसंबर तक निकल सकता है।

इसके अलावा असम के जगीरोड में Tata Electronics की असेंबली और टेस्टिंग सुविधा, Jewar में HCL-Foxconn की पैकेजिंग यूनिट, ओडिशा में सिलिकॉन-कार्बाइड प्लांट और गुजरात तथा राजस्थान की अन्य परियोजनाएं भी पाइपलाइन में हैं।

Semicon 2.0 क्यों है ज्यादा महत्वपूर्ण?

भारत की अगली बड़ी छलांग Semicon 2.0 से जुड़ी है। कैबिनेट ने जुलाई में इसके लिए ₹1.275 लाख करोड़ के खर्च को मंजूरी दी।

पहले चरण में भारत का जोर मुख्य रूप से पैकेजिंग, टेस्टिंग और अपेक्षाकृत परिपक्व तकनीक वाली फैब्रिकेशन क्षमता पर रहा। Semicon 2.0 का लक्ष्य इससे आगे जाकर अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करना है।

इसमें फैब के लिए जरूरी उपकरण और विशेष सामग्री का घरेलू उत्पादन, स्वदेशी चिप डिजाइन और भविष्य में 3nm तथा 2nm जैसी उन्नत तकनीक की दिशा में बढ़ना शामिल है।

सरकार कम से कम 50 फैबलेस चिप-डिजाइन कंपनियों को विकसित करने का लक्ष्य भी रख रही है। फैबलेस कंपनियां चिप डिजाइन करती हैं, जबकि उसका निर्माण दूसरी कंपनियों से कराती हैं।

भारत की चिप जरूरत कितनी बड़ी है?

भारत फिलहाल हर साल करीब 50 अरब डॉलर के सेमीकंडक्टर चिप्स का इस्तेमाल करता है, जबकि घरेलू उत्पादन इसका 3 अरब डॉलर से भी कम है।

2030 तक भारत की चिप खपत 100 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाना सिर्फ आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, ऑटोमोबाइल, दूरसंचार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों के लिए रणनीतिक आवश्यकता भी बन गया है।

सेमीकंडक्टर के साथ Critical Minerals पर भी फोकस

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में महत्वपूर्ण खनिजों यानी Critical Minerals का भी उल्लेख किया। लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट और दुर्लभ पृथ्वी तत्व जैसे खनिज चिप्स, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, मैग्नेट और क्लीन एनर्जी तकनीक के लिए महत्वपूर्ण हैं।

भारत ने National Critical Mineral Mission के तहत घरेलू खनन, विदेशों में खनिज संपत्तियां हासिल करने, रिसाइक्लिंग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी पर जोर दिया है।

सरकार ने Argentina में लिथियम एक्सप्लोरेशन अधिकार हासिल किए हैं और Australia, Chile तथा Brazil के साथ भी महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर सहयोग बढ़ाया है।

Critical Mineral Corridor से क्या बदलेगा?

इस साल के बजट में घोषित Critical Mineral Corridor के तहत Odisha, Kerala, Andhra Pradesh और Tamil Nadu को खनिज प्रसंस्करण और विनिर्माण के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है।

इसका मकसद केवल खनिज निकालना नहीं, बल्कि उन्हें प्रोसेस करके उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलना है। यही वह क्षेत्र है जहां भारत अभी चीन समेत कुछ प्रमुख वैश्विक खिलाड़ियों से पीछे है।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती

भारत ने सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में आधारभूत ढांचा तैयार करना शुरू कर दिया है, लेकिन असली चुनौती स्केल, तकनीक और घरेलू सप्लाई चेन विकसित करने की है।

तीन प्लांट का उत्पादन शुरू होना निश्चित रूप से बड़ा कदम है, लेकिन अत्याधुनिक फैब, 2nm-3nm तकनीक, चिप डिजाइन, विशेष सेमीकंडक्टर उपकरण और खनिजों की प्रोसेसिंग क्षमता में आत्मनिर्भरता हासिल करना भारत की अगली बड़ी परीक्षा होगी।

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