Sajid Rashidi Controversy: कांवड़ियों पर मौलाना साजिद रशीदी के बयान से बवाल, अयोध्या के संत ने जताया विरोध
साजिद रशीदी के कांवड़ियों को लेकर कथित बयान पर अयोध्या के संत स्वामी सीताराम दास ने कड़ी नाराजगी जताई है।
Sajid Rashidi Controversy: कांवड़ यात्रा और कांवड़ियों को लेकर दिए गए ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी के कथित विवादित बयान पर विवाद बढ़ता जा रहा है। रशीदी की टिप्पणी को लेकर अयोध्या के संत स्वामी सीताराम दास ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने मौलाना के बयान को लेकर कड़ा विरोध जताते हुए बेहद आपत्तिजनक और हिंसक भाषा का इस्तेमाल किया। संत ने यहां तक कहा कि रशीदी देश में अराजकता फैलाने का काम कर रहे हैं और उन्हें देश के लिए ‘कैंसर’ और ‘नासूर’ बताया।
दरअसल, मौलाना साजिद रशीदी का एक बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ लोगों के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए उन्हें शिवभक्त कहे जाने पर आपत्ति जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग सड़कों पर नशा करते हैं, पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट करते हैं और रास्ते में आम लोगों को परेशान करते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें शिवभक्त कहा जाता है। इसी बयान को लेकर हिंदू संतों और कांवड़ यात्रा से जुड़े लोगों में नाराजगी देखने को मिल रही है।
रशीदी ने अपने बयान में कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति नशे की हालत में सड़क पर बैठा है या पुलिसकर्मी के साथ मारपीट करता है तो उसे धार्मिक आस्था से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कथित तौर पर स्कूल वैन और बच्चों से जुड़ी एक घटना का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि अगर किसी की वजह से बच्चों को नुकसान पहुंचता है या किसी मरीज को रास्ते में परेशानी होती है और उससे धार्मिक नारे लगाने के लिए कहा जाता है, तो ऐसे व्यक्ति को शिवभक्त कहना उचित नहीं है।
मौलाना के इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अयोध्या के संत स्वामी सीताराम दास ने उन्हें लेकर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि रशीदी लगातार हिंदू धर्म, देवी-देवताओं और धार्मिक आस्थाओं को लेकर विवादित टिप्पणियां करते हैं। संत ने कहा कि ऐसे बयानों से समाज में तनाव बढ़ता है और लोगों के बीच धार्मिक विभाजन पैदा हो सकता है।
स्वामी सीताराम दास ने रशीदी को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया और हिंसा की अपील जैसी बात कही। उन्होंने रशीदी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए और उन्हें देश के लिए ‘कैंसर’ और ‘नासूर’ तक करार दिया। उनके बयान में कथित तौर पर रशीदी के खिलाफ जानलेवा हिंसा के लिए इनाम देने की बात भी कही गई। इस तरह की टिप्पणी के सामने आने के बाद विवाद और गहरा गया है।
संत ने यह भी आरोप लगाया कि मौलाना साजिद रशीदी के बयान देश में अराजकता और तनाव को बढ़ावा देने वाले हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक मामलों पर इस तरह की बयानबाजी से समाज में गलत संदेश जाता है। हालांकि, संत की ओर से इस्तेमाल की गई हिंसक भाषा ने भी एक अलग बहस को जन्म दे दिया है। किसी भी धार्मिक या राजनीतिक विवाद में हिंसा की धमकी या किसी व्यक्ति के खिलाफ जान लेने जैसी अपील को लेकर कानून-व्यवस्था से जुड़े सवाल खड़े होते हैं।
मौलाना साजिद रशीदी का बयान ऐसे समय में सामने आया है जब सावन और कांवड़ यात्रा के दौरान देश के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में शिवभक्त कांवड़ लेकर धार्मिक यात्राएं करते हैं। इस दौरान प्रशासन की ओर से सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को लेकर विशेष इंतजाम किए जाते हैं। कांवड़ यात्रा से जुड़े रास्तों पर पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी भी बढ़ाई जाती है। ऐसे में कांवड़ियों के व्यवहार और यात्रा से जुड़े किसी भी बयान का राजनीतिक और सामाजिक असर तेजी से देखने को मिलता है।
कांवड़ यात्रा भारत की धार्मिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सावन के महीने में बड़ी संख्या में श्रद्धालु अलग-अलग स्थानों से गंगाजल लेकर शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कई जगह प्रशासन की ओर से कैंप, मेडिकल सहायता, यातायात प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। वहीं, यात्रा के दौरान नियमों के उल्लंघन या आम लोगों को होने वाली परेशानी को लेकर समय-समय पर विवाद भी सामने आते रहे हैं।
ऐसे मामलों में यह सवाल भी उठता है कि धार्मिक आस्था और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अगर किसी व्यक्ति की ओर से नियम तोड़े जाते हैं या किसी आम नागरिक, पुलिसकर्मी, बच्चे अथवा मरीज को परेशानी होती है तो कार्रवाई कानून के तहत होनी चाहिए। दूसरी तरफ किसी पूरे धार्मिक समुदाय या श्रद्धालुओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करना भी सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है।
इस पूरे विवाद में फिलहाल दोनों तरफ से तीखी बयानबाजी सामने आई है। एक ओर मौलाना साजिद रशीदी ने कांवड़ियों के व्यवहार को लेकर सवाल उठाए हैं, वहीं दूसरी ओर स्वामी सीताराम दास ने रशीदी की टिप्पणी पर बेहद तीखी और हिंसक प्रतिक्रिया दी है। ऐसे बयानों के बीच सबसे अहम सवाल यही है कि धार्मिक मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा किस तरह की भाषा में होनी चाहिए।
कांवड़ यात्रा जैसे संवेदनशील धार्मिक आयोजन के दौरान नेताओं, धर्मगुरुओं और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। किसी घटना को लेकर सवाल उठाना या विरोध दर्ज कराना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन ऐसी भाषा से बचना जरूरी है जिससे किसी समुदाय की भावनाएं भड़कें या हिंसा को बढ़ावा मिले। अब देखना होगा कि इस विवादित बयानबाजी पर प्रशासन और संबंधित पक्षों की ओर से आगे क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।



