फिर मनचाहे टेंडर शर्तों के आरोपों में फंसा यूपी जल जीवन मिशन

लखनऊ। यूपी के जल जीवन मिशन में गड़बड़ियां थमने का नाम नहीं ले रहीं, जबकि कुछ ही महीनों पहले ही इस परियोजना में बनी कई टंकियां धराशायी होने की खबरों के बाद उच्चस्तरीय जांच का ढिंढोरा पीटा गया था , जिसके बाद कामों की गुणवत्ता और रखरखाव की सलाह देने के लिए तृतीय पक्ष निरीक्षण एजेंसी के चयन करने की बात हुयी थी। लम्बे समय से इस विभाग के प्रमुख सचिव पद पर काबिज चर्चित आईएएस अधिकारी पहले भी विभाग में अपने मनचाहे फैसले को लेकर चर्चित रहे हैं लेकिन उनका तबादला नहीं किया गया है।

बीते अगस्त महीने में इस काम के लिए टेंडर जारी किया गया, जिसमें तमाम त्रुटियां थी। इस टेंडर की शर्तें ऐसी रखी गयी थी, जिससे यह संदेह होता था कि यह किसी कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाने की नीयत से किया गया हो। टेंडर की शर्तो में जितने टर्न ओवर का जिक्र था वह किसी भी भारतीय कंपनी के लिए लगभग असंभव था। जाहिर था की कुछ चुनिन्दा अंतरराष्ट्रीय फर्मों के सिवा कोई भी इन अर्हता को पूरा नहीं कर पायेगा।

टेंडर की प्री बिड मीटिंग में इस क्षेत्र में काम करने वाली कई कंपनियों ने आपत्ति की। कंपनियों का कहना था की टेंडर में ऐसी शर्तें रखी गईं जो क्यूसीआई से मान्यता प्राप्त भारतीय फर्मों को भाग लेने से रोकती थीं। साथ ही तकनीकी मूल्यांकन में 75 करोड़ की कंसल्टेंसी लागत पर 20–30 अंक देने की शर्त अनुचित थी।

टेंडर जारी होने के बाद विभाग के चक्कर लगा रहीं फर्में

साथ ही आपत्ति का एक बिंदु यह भी था कि यह नई फर्मों को हतोत्साहित कर पुरानी फर्मों की एकाधिकार स्थिति बनाता है। इस विषय को लेकर विधान सभा के पंचायती राज समिति के सभापति प्रेम सागर पटेल ने प्रमुख सचिव को पत्र लिख कर नियमो का पालन करने को कहा था। प्री बिड की आपत्तियों को देखते हुए विभाग ने एक समिति बना दी और समिति की बैठक में भी यह माना गया कि शर्तें गलत हैं और फिर इन्हें हटा कर 150 करोड़ परियोजना-लागत का अनुभव मानक रखा गया।
इस सुधार के बाद प्रतिस्पर्धा बढ़ी और नई-पुरानी फर्में बड़ी संख्या में पात्र हुईं।

हालांकि मामले के तूल पकड़ने के बाद इस गड़बड़ी का ठीकरा कनिष्ठ अधिकारीयों पर डालते हुए कुछ कार्यवाहियां भी की गयी, लेकिन परदे के भीतर कुछ और ही चल रहा था।

सीएम के भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस के दावे को लगाया जा रहा पलीता

इसके बाद विभाग में सक्रिय तत्वों ने खेल करना शुरू कर दिया, अचानक बिना कारण बताए टेंडर रद्द कर दिया गया और 8 दिसंबर को इसी काम के लिए एक नयी निविदा जारी कर दी गई जिसमें पुनः परियोजना-लागत हटाकर कंसल्टेंसी लागत जोड़ दी गई, जिससे नई क्वालिटी काउन्सिल आफ इंडिया से मान्यता प्राप्त नयी फर्में फिर से बाहर हो जाएंगी और मनचाही कंपनी को यह टेंडर दे दिया जायेगा।

तकरीबन 800 करोड़ के कामों के इस टेंडर के पीछे कौन से लोग अधिकारियों के चहेते हैं, यह जांच का विषय है। लेकिन इतना तो तय है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस का दावा यहां भी फुसफुसा साबित हो रहा है।

दिसंबर में टेंडर जारी होने के बाद से फर्में विभाग का चक्कर लगा रही हैं, प्री बिड मीटिंग भी हुई जिसमें कंपनियों ने आपत्तियां दर्ज कराई मगर उनकी सुनवाई करने को कोई तैयार नहीं है।

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