Air India Flight Turbulence: फुकेट-दिल्ली फ्लाइट के कैप्टन का डोप टेस्ट पॉजिटिव! टर्बुलेंस में 300 फीट नीचे आया था विमान
फुकेट-दिल्ली एयर इंडिया फ्लाइट में टर्बुलेंस के दौरान 300 फीट नीचे आया था विमान, 145 यात्री थे सवार; 17 लोगों को अस्पताल में कराया गया था भर्ती

Air India Flight Turbulence: फुकेट से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की एक फ्लाइट में कुछ दिन पहले हुआ खौफनाक एयर टर्बुलेंस अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। इस घटना में विमान अचानक करीब 300 फीट नीचे की ओर चला गया था, जिसके बाद यात्रियों में अफरा-तफरी मच गई थी। दिल्ली पहुंचने पर कई यात्रियों और क्रू सदस्यों को अस्पताल ले जाना पड़ा था। अब इस मामले में सामने आई एक जानकारी ने विमान की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, 4 अगस्त को फुकेट से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की इस फ्लाइट के कैप्टन का उड़ान के बाद साइकोएक्टिव सब्सटेंस यानी नशीले या दिमाग पर असर डालने वाले पदार्थों के सेवन को लेकर डोप टेस्ट कराया गया था। बताया जा रहा है कि इस टेस्ट में पायलट के सैंपल में साइकोएक्टिव पदार्थ की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। हालांकि, एयर इंडिया ने इस रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की है। एयरलाइन का कहना है कि पायलटों का फ्लाइट के बाद निर्धारित नियमों के तहत स्क्रीनिंग टेस्ट जरूर कराया गया था, लेकिन टेस्ट के नतीजे एयरलाइन के साथ साझा नहीं किए गए हैं।
यही वजह है कि एयर इंडिया फिलहाल पायलट के डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने की खबर पर आधिकारिक तौर पर कोई निष्कर्ष नहीं दे रही है। एयरलाइन ने यह जरूर कहा है कि जरूरत पड़ने पर वह संबंधित अधिकारियों की जांच में पूरा सहयोग करेगी।
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जिस फ्लाइट के कैप्टन का डोप टेस्ट हुआ, वही विमान उड़ान के दौरान बेहद तेज टर्बुलेंस की चपेट में आया था। एयरबस A320 में उस समय करीब 145 लोग सवार थे। उड़ान के दौरान विमान को हवा के तेज झटकों का सामना करना पड़ा और वह अचानक लगभग 300 फीट नीचे की तरफ चला गया। इस दौरान विमान में बैठे यात्रियों के बीच चीख-पुकार जैसी स्थिति पैदा हो गई।
टर्बुलेंस के कारण कुछ यात्री घायल भी हुए। दिल्ली में विमान के उतरने के बाद यात्रियों और क्रू सदस्यों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक कुल 17 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जिनमें यात्री और क्रू सदस्य शामिल थे।
घटना के बाद अब डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी DGCA पूरे मामले की जांच कर रहा है। जांच का दायरा सिर्फ टर्बुलेंस तक सीमित नहीं है। अधिकारी यह भी देख रहे हैं कि आखिर विमान को इतनी गंभीर स्थिति का सामना क्यों करना पड़ा और उस समय फ्लाइट क्रू ने परिस्थितियों को किस तरह संभाला।
जांच में मौसम की स्थिति, टर्बुलेंस की प्रकृति और विमान पर उसके संभावित तकनीकी प्रभावों को भी देखा जा रहा है। यह भी जांच का हिस्सा है कि क्या टर्बुलेंस के बाद विमान को सीधे दिल्ली ले जाना सही फैसला था या फिर यात्रियों और विमान की सुरक्षा को देखते हुए उसे वाराणसी, लखनऊ या किसी अन्य नजदीकी एयरपोर्ट पर डायवर्ट किया जा सकता था।
एक और अहम सवाल विमान को हुए संभावित तकनीकी नुकसान से जुड़ा है। सूत्रों के मुताबिक जांच में यह भी देखा जा रहा है कि तेज झटकों के कारण विमान के किसी सिस्टम, खासकर हाइड्रोलिक सिस्टम पर कोई असर पड़ा था या नहीं।
कैप्टन के डोप टेस्ट की रिपोर्ट सामने आने के बाद जांच में अब एक नया पहलू जुड़ गया है। हालांकि सिर्फ टेस्ट के पॉजिटिव होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि टर्बुलेंस की घटना या विमान के संचालन पर इसका सीधा असर पड़ा था। यह बात भी जांच का हिस्सा होगी कि टेस्ट में जिस पदार्थ की मौजूदगी मिली, वह क्या था और उसका पायलट की उड़ान के समय की कार्यक्षमता पर कोई प्रभाव पड़ा था या नहीं।
नियमों के तहत ऐसी स्थिति में फ्लाइट क्रू को जांच पूरी होने तक उड़ान ड्यूटी से हटाया जा सकता है। इस मामले में भी संबंधित पायलट फिलहाल फ्लाइंग ड्यूटी पर नहीं हैं।
DGCA के नियमों के मुताबिक, यदि कोई पायलट पहली बार साइकोएक्टिव पदार्थों के लिए पॉजिटिव पाया जाता है तो उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत नशा-मुक्ति और रिहैबिलिटेशन कार्यक्रम से गुजरना पड़ सकता है। इसके बाद नेगेटिव डोप टेस्ट रिपोर्ट आने पर ही उसे दोबारा सक्रिय ड्यूटी पर लौटने की अनुमति मिलती है।
लेकिन अगर फ्लाइंग ड्यूटी पर लौटने के बाद वही व्यक्ति दूसरी बार डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाया जाता है, तो उसका पायलट लाइसेंस तीन साल तक के लिए निलंबित किया जा सकता है। तीसरी बार पॉजिटिव पाए जाने की स्थिति में लाइसेंस रद्द किए जाने का प्रावधान है।
इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन यानी ICAO के नियम भी इस मामले को बेहद गंभीर मानते हैं। नियमों के अनुसार कोई भी लाइसेंसधारी व्यक्ति ऐसे साइकोएक्टिव पदार्थ के प्रभाव में विमान नहीं उड़ा सकता, जिससे विमान को सुरक्षित तरीके से संचालित करने की उसकी क्षमता प्रभावित होती हो।
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फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि पायलट के टेस्ट में वास्तव में कौन सा पदार्थ पाया गया, वह कब और किस परिस्थिति में शरीर में पहुंचा और क्या उसका इस फ्लाइट के संचालन से कोई संबंध था। इसका जवाब DGCA की जांच पूरी होने के बाद ही साफ हो सकेगा।
एक तरफ यात्रियों के लिए टर्बुलेंस का वह अनुभव बेहद डरावना था, तो दूसरी तरफ अब पायलट के डोप टेस्ट की खबर ने विमान सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। हालांकि जांच पूरी होने से पहले किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराना सही नहीं होगा, लेकिन यह मामला एविएशन सेक्टर में सुरक्षा प्रोटोकॉल और पायलटों की फिटनेस जांच की अहमियत को एक बार फिर सामने जरूर लाता है।



