Great Nicobar Project: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर जयराम रमेश का बड़ा दावा, NGT से रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी पर सवाल उठाते हुए NGT से उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।

Great Nicobar Project: ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने NGT से उस उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है, जिसे ग्रेट निकोबार परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरियों की समीक्षा के लिए गठित किया गया था। जयराम रमेश का दावा है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद परियोजना को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें सामने आ सकती हैं और यह भी स्पष्ट हो सकता है कि पर्यावरणीय मंजूरियों की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं।

जयराम रमेश ने रविवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि NGT को अपनी स्वतंत्र भूमिका और अधिकार को दोबारा मजबूती से स्थापित करना चाहिए। उनका कहना है कि न्यायाधिकरणों को अपने कानूनी दायित्वों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में NGT समेत अन्य न्यायाधिकरण अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारियों को प्रभावी तरीके से निभाएंगे।

कांग्रेस नेता ने अपने बयान में न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा में इस विधेयक पर चर्चा होने वाली है। यह विधेयक देश में काम कर रहे 16 अर्द्ध-न्यायिक अधिकरणों की व्यवस्था और उनके कामकाज से जुड़ी दिशा तय कर सकता है। इनमें राष्ट्रीय हरित अधिकरण भी शामिल है, जिसकी स्थापना अक्टूबर 2010 में संसद के कानून के तहत पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए की गई थी।

जयराम रमेश ने न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता को लेकर केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले भी न्यायाधिकरणों की शक्तियों और स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले प्रावधानों का विरोध किया है। उनका दावा है कि वित्त अधिनियम, 2017 के जरिए भी न्यायाधिकरणों की व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए गए थे, जिनसे उनकी स्वतंत्रता पर असर पड़ने की आशंका थी।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि न्यायाधिकरणों से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों को धन विधेयक के रास्ते आगे बढ़ाया गया, जिससे संसद के दोनों सदनों में उनकी विस्तृत समीक्षा की संभावना सीमित हो गई। रमेश के मुताबिक, खास तौर पर राज्यसभा में किसी विधेयक की व्यापक चर्चा और समीक्षा से बचने के लिए इस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया।

ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर कांग्रेस नेता लंबे समय से पर्यावरणीय चिंताएं उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि यह परियोजना पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र में प्रस्तावित है और इसलिए इसकी मंजूरी से पहले पर्यावरणीय प्रभावों का गंभीर और स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि आलोचनाओं और अदालतों के पुराने निर्देशों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जिससे संस्थागत स्तर पर नुकसान हुआ।

रमेश ने दावा किया कि NGT सरकार के लिए कई बार असहज भूमिका निभाता रहा है और इसी वजह से न्यायाधिकरण की स्वतंत्रता का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने 2021 में न्यायाधिकरणों से संबंधित कानून का उच्चतम न्यायालय में मजबूती से बचाव किया था, लेकिन बाद में उसे उन्हीं में से कई सुधारों को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा, जिनकी जरूरत लंबे समय से बताई जा रही थी।

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अब जयराम रमेश की सबसे बड़ी मांग ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की है। उन्होंने बताया कि समिति की रिपोर्ट 8 जुलाई 2025 को NGT के सामने सीलबंद लिफाफे में पेश की गई थी। रमेश का कहना है कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरियों की समीक्षा के दौरान समिति ने क्या निष्कर्ष दिए थे और किन आधारों पर आगे की प्रक्रिया तय हुई।

उन्होंने कहा कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करना NGT की पारदर्शिता और स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण संकेत होगा। साथ ही इससे यह भी पता चल सकेगा कि ग्रेट निकोबार परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी देने की प्रक्रिया में किन पहलुओं पर विचार किया गया था।

इस पूरे विवाद के बीच न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 भी महत्वपूर्ण हो गया है। प्रस्तावित कानून में न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति, उनकी योग्यता और चयन प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के साथ स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इसमें राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन की व्यवस्था का भी प्रस्ताव है।

फिलहाल ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर राजनीतिक बहस के साथ पर्यावरण और न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता का मुद्दा भी जुड़ गया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि NGT समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करता है या नहीं और न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 पर संसद में किस तरह की चर्चा होती है।

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