Sambhal Violence: संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत खत्म; यूपी सरकार पर 10 लाख की लागत
Sambhal Violence: पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को नहीं माना पर्याप्त आधार, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनाया फैसला
Sambhal Violence: संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा के मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जारी निरोध आदेश को रद्द कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई। अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए आरोपी के कबूलनामे को अकेले निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता।
यह मामला संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान नवंबर 2024 में हुई हिंसा से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू शामिल थे। दोनों न्यायाधीशों की पीठ ने इससे पहले 8 सितंबर को मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
कबूलनामे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत में दिया गया बयान किसी व्यक्ति को NSA के तहत निवारक हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त आधार हो सकता है।
अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार अफरोज की पुलिस हिरासत में दर्ज स्वीकारोक्ति के आधार पर उसके खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश पारित नहीं कर सकती थी। शीर्ष अदालत ने इसी आधार पर NSA के तहत जारी हिरासत आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत की सुनवाई के दौरान भी इस बात पर सवाल उठाया गया था कि NSA जैसी निवारक हिरासत के लिए अधिकारियों के पास पर्याप्त और प्रासंगिक सामग्री होना जरूरी है या नहीं और क्या पुलिस कस्टडी में दिया गया कथित कबूलनामा अकेले इस कार्रवाई का आधार बन सकता है।
2024 की हिंसा से जुड़ा है मामला
संभल की शाही जामा मस्जिद में अदालत के आदेश पर सर्वे कराया गया था। इसके विरोध में 24 नवंबर 2024 को हिंसा भड़क गई थी। इस दौरान चार लोगों की मौत हुई थी। अफरोज को इस हिंसा के मामले में आरोपी बनाया गया था।
पुलिस ने घटना के करीब 54 दिन बाद 17 जनवरी 2025 को अफरोज को गिरफ्तार किया था। लगभग नौ महीने जेल में रहने के बाद उसे 9 सितंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिली थी।
जमानत के बाद फिर NSA के तहत हिरासत
अफरोज को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के करीब एक महीने बाद, 13 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार ने उसके खिलाफ NSA के तहत कार्रवाई की और उसे फिर हिरासत में ले लिया।
राज्य सरकार की ओर से इस कार्रवाई के लिए मामले से संबंधित उपलब्ध सामग्री का हवाला दिया गया था। सरकार का पक्ष था कि अफरोज की रिहाई के बाद दोबारा हिंसा होने या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
अफरोज की ओर से किन फैसलों का दिया गया हवाला?
सुप्रीम कोर्ट में अफरोज की ओर से रेखा बनाम तमिलनाडु और अमीना बेगम बनाम तेलंगाना सहित पहले के फैसलों का हवाला दिया गया। उनकी ओर से दलील दी गई कि NSA के तहत निवारक हिरासत के लिए पर्याप्त सामग्री और उसका उचित विचार जरूरी है।
अफरोज की ओर से यह भी कहा गया कि उसका नाम पहले कुछ आपराधिक मामलों में रहा है, लेकिन केवल पुराने आपराधिक मामलों का होना अपने आप में निवारक हिरासत का आधार नहीं बन सकता।
यूपी सरकार पर क्यों लगाया गया 10 लाख रुपये का खर्च?
शीर्ष अदालत ने हिरासत आदेश को रद्द करने के साथ उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत भी लगाई। अदालत ने NSA के तहत जारी हिरासत आदेश को कानून के अनुरूप नहीं माना। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की ओर से निवारक हिरासत की शक्ति के इस्तेमाल को अवैध माना और इसी के चलते लागत लगाई।
फैसले का मुख्य बिंदु
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला निवारक हिरासत के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे की भूमिका से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी के पुलिस कस्टडी में दिए गए कथित बयान को अकेले NSA के तहत हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता।



