Editorial Update: पत्रकार और ‘दो जून’ की रोटी का संघर्ष: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की अनकही कहानी
दूसरों की आवाज उठाने वाला पत्रकार अक्सर अपनी आर्थिक चुनौतियों से अकेले जूझता है। जमीनी पत्रकारिता की हकीकत पर एक व्यंग्यात्मक लेकिन विचारोत्तेजक लेख।
Editorial Update: कहते हैं, पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है। यह बात सुनकर अक्सर पत्रकार मुस्कुरा देता है, क्योंकि उसे अच्छी तरह पता है कि वह स्तंभ तो है, लेकिन उस पर छत किसी और की टिकी हुई है। उसकी अपनी छत कब टपकने लगे, इसका कोई भरोसा नहीं।
देश में पत्रकारिता का इतिहास गौरवशाली बताया जाता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक पत्रकारों ने कलम की ताकत से साम्राज्य हिला दिए। लेकिन आज का जमीनी पत्रकार सुबह घर से निकलते समय यह सोचकर निकलता है कि शाम को खबर पहले भेजे या घर के लिए सब्जी लेकर जाए।
दूसरों की समस्याओं का मसीहा, खुद की बात पर मौन
पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है, जिसमें व्यक्ति दूसरों की समस्याएं उठाने और उनके समाधान के लिए दिन-रात भागता है, लेकिन अपनी समस्या बताने में संकोच करता है। वह जिले के कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक से बेबाक सवाल पूछ सकता है, लेकिन महीने के अंत में किराने वाले से उधार मांगते समय उसकी आवाज धीमी पड़ जाती है।
आज का पत्रकार बड़ी विचित्र स्थिति में है। वह करोड़ों के घोटाले उजागर करता है, लेकिन उसके अपने खाते में अक्सर चार अंकों का बैलेंस भी नहीं होता। वह उद्योगपतियों की सफलता की कहानी लिखता है, लेकिन अपनी मोटरसाइकिल में पेट्रोल डलवाने से पहले मोबाइल बैंकिंग का बैलेंस जांचता है।
समाज की उम्मीदें बनाम कड़वी हकीकत
मजेदार बात यह है कि समाज पत्रकार को बहुत शक्तिशाली मानता है। मोहल्ले में कोई विवाद हो जाए तो लोग कहते हैं, “अरे भाई, पत्रकार हैं, सब करवा देंगे।” लेकिन वही पत्रकार बिजली का बिल जमा करने की आखिरी तारीख निकल जाने पर लाइन में खड़ा दिखाई देता है।
पत्रकार का जीवन भी बड़ा रोचक है। सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस, दोपहर में धरना-प्रदर्शन, शाम को दुर्घटना की कवरेज और रात को खबर लिखना। इन सबके बीच जब घर से फोन आता है कि “आते समय आटा लेते आना”, तो पत्रकार का जवाब होता है— “पहले खबर भेज लूं, फिर देखता हूं।”
दोहरा संघर्ष: खबर पाना और घर चलाना
असल में पत्रकारिता में दो तरह के संघर्ष चलते हैं— एक खबर पाने का और दूसरा घर चलाने का।
- वह प्रशासन, राजनीति और भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ता है।
- वह महंगाई, बच्चों की स्कूल फीस, गैस सिलेंडर और राशन की दुकान से भी लड़ता है।
आजकल कई संस्थानों में पत्रकारों की हालत ऐसी है कि उनसे उम्मीद की जाती है कि वे कैमरा भी चलाएं, वीडियो भी बनाएं, एंकरिंग भी करें, सोशल मीडिया भी संभालें और विज्ञापन भी लाएं। यानी एक व्यक्ति में पूरा मीडिया हाउस समाहित होना चाहिए। लेकिन जब वेतन या मानदेय की बात करो तो जवाब मिलता है— “आपको पहचान मिल रही है न!”
यह पहचान भी बड़ी अद्भुत चीज है। बाजार में दुकानदार कहता है, “अरे, आप तो पत्रकार हैं!” लेकिन जब सामान खरीदने की बारी आती है, तो पहचान नहीं, केवल नकद भुगतान ही स्वीकार किया जाता है।
विडंबनाओं के बीच जिंदा है जुनून
पत्रकार की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह रोज दूसरों की सफलता की खबरें लिखता है। किसी का सम्मान समारोह, किसी का पुरस्कार, किसी की पदोन्नति, तो किसी का नया बंगला। लेकिन जब वह अपनी जिंदगी की खबर लिखने बैठे, तो शीर्षक कुछ ऐसा बनता है— “पत्रकार ने फिर एक महीने की किस्त समय पर भरने के लिए संघर्ष किया।”
फिर भी देश और समाज में पत्रकारिता चल रही है। इसलिए नहीं कि इसमें अपार धन है, बल्कि इसलिए कि इसमें अब भी कुछ लोग जुनून से जुड़े हुए हैं। वे मानते हैं कि खबर सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।
यही कारण है कि तमाम आर्थिक कठिनाइयों, अनिश्चितताओं और व्यवस्था की उपेक्षाओं के बावजूद पत्रकार सुबह फिर कैमरा उठाता है, नोटबुक संभालता है और मैदान में निकल पड़ता है। शायद इसी उम्मीद में कि कभी लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को भी उतनी ही मजबूती मिलेगी, जितनी मजबूती से यह दूसरों के अधिकारों के लिए खड़ा रहता है।
तब तक पत्रकार का यह मूक संघर्ष जारी रहेगा— एक हाथ में धारदार कलम और दूसरे हाथ में ‘दो जून’ की रोटी की चिंता लिए हुए।



