संसद में 40 दिन से जारी है मॉनसून सत्र का सस्पेंस, महिला आरक्षण पर फिर बढ़ी हलचल

13 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित होने के 40 दिन बाद भी मॉनसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ है। इसी बीच महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर विशेष सत्र की चर्चा तेज है।

संसद का मॉनसून सत्र भले ही 13 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ खत्म हो गया था, लेकिन इसका औपचारिक सत्रावसान अब तक नहीं हुआ है। 22 सितंबर तक दोनों सदनों को स्थगित हुए 40 दिन हो चुके हैं। संसदीय इतिहास में इतनी लंबी अवधि तक दोनों सदनों का सत्रावसान नहीं होना एक नया रिकॉर्ड बताया जा रहा है। पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचारी ने भी इस अवधि को अभूतपूर्व बताया है।

आमतौर पर सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद कुछ दिनों के भीतर राष्ट्रपति की ओर से सत्रावसान की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। इस बार ऐसा नहीं हुआ है। इसी वजह से संसद के अगले कदम और संभावित विशेष सत्र को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है।

महिला आरक्षण और परिसीमन पर क्यों बढ़ी चर्चा?

मॉनसून सत्र के औपचारिक रूप से समाप्त नहीं होने को महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। इससे पहले अप्रैल में सरकार ने लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 और परिसीमन विधेयक, 2026 समेत संबंधित प्रस्ताव पेश किए थे। इनका उद्देश्य परिसीमन के जरिए लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण को लागू करने का रास्ता तैयार करना था। हालांकि संविधान संशोधन विधेयक को जरूरी बहुमत नहीं मिला और उस पर आगे की कार्रवाई नहीं हो सकी।

महिला आरक्षण से जुड़ा मौजूदा संवैधानिक प्रावधान 2023 के 106वें संविधान संशोधन से आया था। इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। इसकी प्रभावी शुरुआत जनगणना और उसके बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ी हुई है।

2029 के चुनाव से पहले बदलाव की चर्चा

मौजूदा घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2029 में अगला लोकसभा चुनाव होना है। संसदीय मामलों पर नजर रखने वाले संगठनों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के विकल्पों पर विचार कर रही है।

सितंबर में कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि केंद्र विशेष सत्र बुलाने के विकल्प पर विचार कर रहा है। ऐसी रिपोर्टों में महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित विधेयकों को संभावित विशेष सत्र के एजेंडे से जोड़ा गया है। हालांकि 22 सितंबर तक विशेष सत्र की तारीख या कार्यक्रम को लेकर सरकार की ओर से कोई औपचारिक घोषणा सामने नहीं आई थी।

दक्षिणी राज्यों की चिंताओं का मुद्दा

महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया में सबसे बड़ी बहस परिसीमन को लेकर रही है। दक्षिणी राज्यों की ओर से यह चिंता जताई गई है कि आबादी के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण से लोकसभा में उनके मौजूदा प्रतिनिधित्व का अनुपात प्रभावित हो सकता है।

सरकार की ओर से पेश किए गए 2026 के प्रस्ताव में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाने का मॉडल रखा गया था। सरकार ने बताया था कि सीटों में 50 प्रतिशत की वृद्धि किए जाने पर कुल संख्या 816 तक जा सकती है और दक्षिणी राज्यों की सीटों की संख्या भी बढ़ेगी। सरकार का तर्क है कि इससे प्रतिनिधित्व में संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

वहीं, PRS Legislative Research के विश्लेषण के अनुसार 2026 के परिसीमन विधेयक में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाने और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन का रास्ता बनाने जैसे प्रस्ताव शामिल थे।

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पहले भी हुआ था ऐसा लंबा अंतर

पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचारी के मुताबिक, इससे पहले 2015 में दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने और सत्रावसान के बीच 28 दिनों का अंतर रहा था। उस समय सरकार वस्तु एवं सेवा कर यानी GST से जुड़े कानून पर आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही थी। इस बार 40 दिन का अंतर उस पुराने रिकॉर्ड से आगे निकल गया है।

इसलिए मौजूदा स्थिति को सिर्फ संसदीय प्रक्रिया की देरी के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। सत्रावसान नहीं होने और महिला आरक्षण तथा परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर पहले हो चुकी कार्रवाई के बीच संभावित विशेष सत्र की चर्चा ने पूरे घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बना दिया है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार आगे इन्हीं विधेयकों को किस रूप में और कब संसद के सामने लाएगी।

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