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New Delhi: AIIMS दिल्ली में मंत्रालय के आदेश पर अड़चन, प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल

डॉ. एके बिसोई मामले में जांच में नहीं मिले आरोप, फिर भी रिपोर्ट मंत्रालय तक नहीं पहुंची; सर्जरी और सिस्टम दोनों पर असर

New Delhi: देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में गिने जाने वाले AIIMS New Delhi एक बार फिर प्रशासनिक विवादों के चलते सुर्खियों में है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद संस्थान में आदेशों के पालन को लेकर जो अनिश्चितता बनी हुई है, उसने न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि संस्थान की पारदर्शिता और जवाबदेही को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

मामला उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्वास्थ्य मंत्री की स्वीकृति के साथ डॉ. एके बिसोई को कार्डियो-थोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी (CTVS) विभाग के प्रमुख के रूप में अपना कार्य जारी रखने की अनुमति दी थी। यह आदेश स्पष्ट था और तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना अपेक्षित था। हालांकि, संस्थान के निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास की ओर से इस आदेश को पूरी तरह लागू नहीं किए जाने की खबरें सामने आई हैं, जिससे प्रशासनिक स्तर पर असमंजस और असंतोष की स्थिति पैदा हो गई है।

डॉ. बिसोई के खिलाफ की गई शिकायतों को लेकर AIIMS प्रशासन ने कई स्तरों पर विस्तृत जांच करवाई थी। 9 अक्टूबर को प्रारंभिक जांच पूरी की गई, जिसके बाद 24 अक्टूबर को आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने मामले की समीक्षा की। इसके बाद 25 नवंबर को SC/ST शिकायत निवारण समिति ने भी अपनी जांच पूरी कर 3 दिसंबर तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। इन सभी जांच प्रक्रियाओं का निष्कर्ष एक जैसा रहा—डॉ. बिसोई के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं हो पाई।

इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया, जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने 19 जनवरी को जारी अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा कि इस मामले में SC/ST से संबंधित कोई मुद्दा नहीं पाया गया। आयोग की इस स्पष्ट टिप्पणी के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि मामले को जल्द समाप्त कर प्रशासनिक स्पष्टता लाई जाएगी।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी महत्वपूर्ण जांच रिपोर्ट्स अब तक स्वास्थ्य मंत्रालय को औपचारिक रूप से नहीं भेजी गई हैं। यह देरी कई सवाल खड़े करती है—क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है, या फिर इसके पीछे कोई और कारण है? एक शीर्ष राष्ट्रीय संस्थान में इस तरह की प्रक्रिया में देरी संस्थागत कार्यप्रणाली पर सीधा असर डालती है और पारदर्शिता को लेकर संदेह पैदा करती है।

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इस प्रशासनिक खींचतान का असर अब संस्थान के कामकाज पर भी दिखाई देने लगा है। CTVS विभाग, जो कि गंभीर हृदय और सर्जिकल मामलों के लिए जाना जाता है, वहां सर्जरी की संख्या में लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा, कई वरिष्ठ डॉक्टरों के इस्तीफे ने न केवल चिकित्सा सेवाओं को प्रभावित किया है, बल्कि संस्थान के शैक्षणिक माहौल को भी कमजोर किया है। यह स्थिति मरीजों के लिए भी चिंता का विषय बनती जा रही है, जिन्हें समय पर और उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा सेवाओं की आवश्यकता होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के विवाद और प्रशासनिक अनिश्चितता किसी भी संस्थान की कार्यक्षमता को कमजोर कर सकते हैं। AIIMS जैसे संस्थान, जो पूरे देश के लिए एक मॉडल के रूप में देखे जाते हैं, वहां इस तरह की स्थिति का पैदा होना और लंबा खिंचना चिंताजनक है।

अब सभी की निगाहें स्वास्थ्य मंत्रालय पर टिकी हैं। यह अपेक्षा की जा रही है कि मंत्रालय इस मामले में जल्द हस्तक्षेप करेगा, अपने आदेशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराएगा और सभी लंबित रिपोर्टों को तत्काल प्राप्त कर स्थिति को स्पष्ट करेगा। इसके साथ ही संस्थान के भीतर स्थिरता और सामान्य कार्यप्रणाली को बहाल करना भी जरूरी है, ताकि मरीजों और डॉक्टरों दोनों का भरोसा कायम रह सके।

अंततः, AIIMS New Delhi जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना बेहद जरूरी है। यह केवल एक व्यक्ति या पद का मामला नहीं है, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है। यदि समय रहते इस स्थिति को संभाला नहीं गया, तो इसका प्रभाव दूरगामी हो सकता है, जो न केवल संस्थान बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

Written By: Anushri Yadav

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