International Update: यूएन में भारत ने विकास को बनाया केंद्रबिंदु, उप महासचिव अमीना मोहम्मद के साथ हुई उच्च स्तरीय वार्ता
संयुक्त राष्ट्र में भारत ने विकास स्तंभ की प्रधानता, राष्ट्रीय स्वामित्व और पारदर्शी वैश्विक विकास ढांचे की आवश्यकता पर दिया जोर
International Update: संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ईकोसॉक) के सत्र में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने विकास के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव तथा सतत विकास समूह की अध्यक्ष अमीना जे. मोहम्मद के साथ उच्च स्तरीय संवाद में हिस्सा लिया।
वार्ता के दौरान भारत ने विकास को संयुक्त राष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए इसे संरक्षित रखने और सदस्य देशों की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को विकास के केंद्र में रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र के विकास स्तंभ की प्रधानता किसी भी स्थिति में बनी रहनी चाहिए, क्योंकि यह शांति और सुरक्षा के साथ संगठन के मूल कार्यों में शामिल है।
भारत की ओर से कहा गया कि वैश्विक विकास से जुड़े सभी प्रयास सदस्य देशों की राष्ट्रीय आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप होने चाहिए। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र की नीतियां स्थानीय परिस्थितियों और सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जानी चाहिए।
राजदूत पी. हरीश ने संवाद के बाद सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जानकारी साझा करते हुए लिखा कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के विकास स्तंभ की प्रधानता बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने दोहराया कि सभी विकास प्रयासों के केंद्र में ‘राष्ट्रीय स्वामित्व’ की अवधारणा होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि ‘रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर प्रणाली’ में किया जाने वाला कोई भी पुनर्समायोजन ऐसा होना चाहिए, जिससे विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और सदस्य देशों को मिलने वाले सहयोग को और अधिक मजबूत बनाया जा सके।
हरीश ने आगे बताया कि इस प्रणाली के भविष्य के वित्तपोषण और शासन व्यवस्था को लेकर चर्चाएं अभी जारी हैं। ऐसे में भारत ने पारदर्शिता, जवाबदेही और ‘रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर प्रणाली’ के विकास संबंधी प्रभावों के व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।
भारत का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब संयुक्त राष्ट्र के विकास तंत्र को अधिक प्रभावी, जवाबदेह और सदस्य देशों की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने पर वैश्विक स्तर पर चर्चा तेज हो रही है। भारत लगातार इस बात की वकालत करता रहा है कि विकास संबंधी नीतियों और कार्यक्रमों में स्थानीय जरूरतों, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सदस्य देशों की भागीदारी को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए।
(रिपोर्ट: शाश्वत तिवारी)



