Crisis: खुद कर्ज के बोझ तले दबा पाकिस्तान बना कर्जदार देशों के मंच का अध्यक्ष, भारत पर क्या होगा असर?
Crisis: संयुक्त राष्ट्र समर्थित Borrowers’ Platform की कमान संभालेंगे पाक वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब, IMF से बार-बार मदद लेने वाले देश को मिली नई जिम्मेदारी
Crisis: पाकिस्तान खुद लंबे समय से कर्ज और आर्थिक दबाव से जूझ रहा है, लेकिन अब उसे दुनिया के कर्जदार देशों को एक मंच पर लाने वाली पहल की अगुवाई करने की जिम्मेदारी मिली है। बैंकॉक में पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित Borrowers’ Platform की गवर्निंग काउंसिल की अध्यक्षता संभाली। इस घटनाक्रम ने इसलिए ध्यान खींचा है, क्योंकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता और कर्ज पर निर्भर रही है।
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 तक पाकिस्तान का कुल बाहरी कर्ज 137.55 अरब डॉलर था। वर्ष 2023 में देश को भुगतान संकट का सामना करना पड़ा था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से 3 अरब डॉलर के सहायता कार्यक्रम ने उसे तत्काल आर्थिक दबाव से उबरने में मदद की थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो देश खुद कर्ज के संकट से जूझ रहा है, उसे दूसरे कर्जदार देशों का नेतृत्व क्यों सौंपा गया?
इसका जवाब समझने के लिए Borrowers’ Platform के उद्देश्य, वैश्विक कर्ज व्यवस्था और पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है। यह अध्यक्षता पाकिस्तान को कोई अतिरिक्त वित्तीय सहायता या कर्ज चुकाने में छूट नहीं देती। इसका मकसद विकासशील देशों को अपने अनुभव साझा करने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सामूहिक रूप से चर्चा करने का अवसर देना है।
क्या है Borrowers’ Platform?
Borrowers’ Platform की शुरुआत अप्रैल 2026 में हुई। इसका सचिवालय संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन यानी UNCTAD से जुड़ा है। इस पहल का उद्देश्य कर्ज लेने वाले विकासशील देशों को एक साझा मंच उपलब्ध कराना है, ताकि वे कर्ज प्रबंधन, वित्तीय चुनौतियों और आर्थिक विकास से जुड़े अनुभव साझा कर सकें।
आसान भाषा में समझें तो यह उन देशों का मंच है, जिन्हें विकास परियोजनाओं, सरकारी खर्च और आर्थिक संकटों से निपटने के लिए बाहरी वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ती है। इन देशों के सामने अक्सर कर्ज चुकाने, ब्याज का बोझ संभालने और जरूरी विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटाने जैसी चुनौतियां रहती हैं।
अब तक अंतरराष्ट्रीय कर्ज व्यवस्था में कर्ज देने वाले देशों और संस्थानों के पास अपनी नीतियों पर चर्चा करने के लिए स्थापित मंच रहे हैं। उदाहरण के तौर पर पेरिस क्लब कर्जदाता देशों का एक समूह है, जो आधिकारिक द्विपक्षीय कर्ज से जुड़े मामलों पर काम करता है। इसके मुकाबले कर्ज लेने वाले विकासशील देशों के पास ऐसा स्थायी साझा मंच नहीं था, जहां वे एक साथ अपनी समस्याएं रख सकें।
Borrowers’ Platform इसी कमी को दूर करने की कोशिश है। हालांकि, इसे कर्जदाताओं के साथ औपचारिक सौदेबाजी करने वाली संस्था मानना सही नहीं होगा। इसका मुख्य जोर सहयोग, जानकारी साझा करने और वैश्विक वित्तीय बहस में कर्जदार देशों की भागीदारी बढ़ाने पर है।
खुद आर्थिक संकट से जूझ रहा है पाकिस्तान
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति लंबे समय से दबाव में रही है। विदेशी मुद्रा की कमी, कर्ज भुगतान की जरूरत, राजकोषीय चुनौतियां और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता पर निर्भरता उसकी अर्थव्यवस्था के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे हैं।
वर्ष 2023 में पाकिस्तान भुगतान संकट के बेहद करीब पहुंच गया था। उस समय IMF के 3 अरब डॉलर के स्टैंड-बाय अरेंजमेंट ने देश को तत्काल वित्तीय राहत देने में भूमिका निभाई। इसके बाद 2024 में पाकिस्तान को IMF का 7 अरब डॉलर का विस्तारित सहायता कार्यक्रम मिला। रिपोर्ट में 1.3 अरब डॉलर के जलवायु सहनशीलता संबंधी वित्तपोषण का भी उल्लेख है।
सितंबर 2026 में पाकिस्तान और IMF के बीच लगभग 1.21 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि से जुड़ा समझौता होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। इस तरह के कार्यक्रम देश को भुगतान संतुलन संभालने और आर्थिक स्थिरता के लिए सहायता दे सकते हैं, लेकिन इनके साथ आमतौर पर नीतिगत शर्तें और भुगतान संबंधी दायित्व भी जुड़े रहते हैं।
इसलिए नया कर्ज मिलना अपने आप में कर्ज संकट का स्थायी समाधान नहीं होता। यदि किसी देश की आय, निर्यात और विदेशी मुद्रा अर्जित करने की क्षमता उसके भुगतान दायित्वों के अनुरूप नहीं बढ़ती, तो उसे आगे भी कर्ज या वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
कर्ज लेने वाला देश दूसरों को क्या सिखाएगा?
पाकिस्तान को अध्यक्षता मिलने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जो देश खुद IMF से बार-बार मदद लेता रहा है, वह दूसरे देशों के लिए क्या योगदान दे सकता है?
इसका जवाब यह है कि Borrowers’ Platform की अध्यक्षता का अर्थ किसी देश को आर्थिक रूप से सफल या कर्ज प्रबंधन में आदर्श घोषित करना नहीं है। मंच की मूल सोच यह है कि कर्ज से प्रभावित देशों को अपने अनुभव साझा करने और साझा समस्याओं को समझने का अवसर मिलना चाहिए।
पाकिस्तान ने लंबे समय तक कर्ज भुगतान, IMF कार्यक्रमों और आर्थिक सुधारों से जुड़े दबाव का सामना किया है। उसका अनुभव यह समझने में उपयोगी हो सकता है कि वित्तीय संकट के दौरान किसी देश को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, किसी संकट का अनुभव होना और उससे सफलतापूर्वक बाहर निकल जाना दो अलग बातें हैं।
इसी कारण पाकिस्तान की नई भूमिका को आर्थिक सफलता के प्रमाण के तौर पर नहीं, बल्कि कर्जदार देशों के बीच सहयोग की पहल के रूप में समझना चाहिए। मंच की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसमें शामिल देश अनुभव साझा करने के साथ कर्ज की स्थिरता और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े ठोस मुद्दों पर कितनी प्रगति कर पाते हैं।
पाकिस्तान को ही क्यों मिली अध्यक्षता?
पाकिस्तान के चयन का अर्थ यह नहीं है कि उसे दुनिया का सबसे बेहतर कर्ज प्रबंधक माना गया है। Borrowers’ Platform का उद्देश्य किसी एक देश को आदर्श उदाहरण के रूप में पेश करने के बजाय कर्ज लेने वाले देशों को सामूहिक आवाज देना है।
रिपोर्ट में UNCTAD की अधिकारी पेनेलोप हॉकिन्स के हवाले से कहा गया है कि कर्जदाताओं के पास लंबे समय से संगठित मंच मौजूद रहे हैं, जबकि कर्जदार देशों के पास ऐसा स्थायी ढांचा नहीं था। इस संदर्भ में नए मंच की स्थापना को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
पाकिस्तान की अध्यक्षता उसे कर्ज की शर्तें बदलने, भुगतान टालने या IMF से अतिरिक्त सहायता पाने का स्वतः अधिकार नहीं देती। उसकी भूमिका मंच के कामकाज को आगे बढ़ाने, देशों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने और कर्ज संबंधी चुनौतियों पर चर्चा कराने तक सीमित है।
इसलिए अध्यक्षता को पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति की पुष्टि या उसके वित्तीय रिकॉर्ड पर किसी अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के रूप में देखना भ्रामक होगा।
IMF के कर्ज और भुगतान का दबाव कितना अहम?
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए केवल नए कर्ज की रकम देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि देश को पुराने कर्ज पर कितना भुगतान करना है और उसकी विदेशी मुद्रा अर्जित करने की क्षमता कितनी है।
रिपोर्ट में IMF के भुगतान कार्यक्रम के हवाले से बताया गया है कि पाकिस्तान को 2026 में करीब 610.8 मिलियन विशेष आहरण अधिकार यानी SDR का भुगतान करना है। यह राशि लगभग 81 करोड़ डॉलर के बराबर बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भुगतान का अनुमान 2027 में बढ़कर 1.66 अरब SDR और 2028 में 1.76 अरब SDR हो सकता है।
इन आंकड़ों का अर्थ यह है कि पाकिस्तान को आने वाले वर्षों में अपने वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने होंगे। यदि नए कर्ज से मिलने वाली राशि का बड़ा हिस्सा पुराने भुगतान और वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में चला जाता है, तो अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रह सकता है।
हालांकि, किसी देश की कर्ज स्थिति का सही आकलन करने के लिए उसके कुल बाहरी कर्ज के साथ सरकारी राजस्व, निर्यात, विदेशी मुद्रा भंडार, ब्याज भुगतान और कर्ज की परिपक्वता अवधि जैसे संकेतकों को भी देखना जरूरी है।
भारत के लिए इस घटनाक्रम के क्या मायने हैं?
पाकिस्तान को Borrowers’ Platform की अध्यक्षता मिलने से भारत पर सीधे किसी नए वित्तीय दायित्व या कर्ज भुगतान का असर पड़ने की बात सामने नहीं आती। यह मंच मुख्य रूप से कर्ज लेने वाले देशों के बीच सहयोग और वित्तीय नीतियों पर चर्चा के लिए बनाया गया है।
फिर भी, भारत के लिए यह घटनाक्रम व्यापक आर्थिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत सहित कई विकासशील देशों के लिए वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, कर्ज की लागत, विकास परियोजनाओं के लिए संसाधन और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे अहम हैं।
यदि Borrowers’ Platform कर्ज की पारदर्शिता, जिम्मेदार उधारी, भुगतान क्षमता और विकासशील देशों की वित्तीय जरूरतों पर सार्थक चर्चा को आगे बढ़ाता है, तो इससे वैश्विक आर्थिक बहस को लाभ मिल सकता है। ऐसे मुद्दों पर भारत समेत अन्य विकासशील देश भी अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं और अनुभवों को सामने रख सकते हैं।
लेकिन पाकिस्तान को अध्यक्षता मिलने मात्र से भारत की आर्थिक स्थिति, कर्ज नीति या अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के साथ संबंधों में तत्काल बदलाव होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। भारत के लिए इस मंच की अहमियत उसके काम, सदस्य देशों की भागीदारी और उससे निकलने वाले प्रस्तावों पर निर्भर करेगी।
क्या बैठकों से कर्ज संकट का समाधान निकल पाएगा?
कर्जदार देशों का साझा मंच बनना एक महत्वपूर्ण संस्थागत पहल हो सकती है, लेकिन केवल बैठकें और चर्चाएं किसी देश के कर्ज संकट को समाप्त नहीं कर सकतीं। इसके लिए आर्थिक विकास, राजस्व में सुधार, निर्यात बढ़ाने, खर्च के प्रबंधन और कर्ज के जिम्मेदार इस्तेमाल जैसे कदम भी जरूरी होते हैं।
पाकिस्तान के सामने भी यही चुनौती है। उसे अपने वित्तीय दायित्व पूरे करने के साथ अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने और बाहरी सहायता पर निर्भरता कम करने की जरूरत है। अध्यक्षता मिलने से इन चुनौतियों का समाधान अपने आप नहीं होगा।
Borrowers’ Platform की सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि क्या यह कर्जदार देशों को बेहतर जानकारी, अधिक पारदर्शिता और वित्तीय निर्णयों में सार्थक भागीदारी दिला पाता है। यदि मंच ठोस सहयोग विकसित करता है, तो यह विकासशील देशों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन इसका वास्तविक असर समय और इसके कामकाज से ही स्पष्ट होगा।
पाकिस्तान की नई भूमिका का असली महत्व
पाकिस्तान का कर्ज संकट और उसे कर्जदार देशों के मंच की अध्यक्षता मिलना पहली नजर में विरोधाभासी लग सकता है। लेकिन इस नियुक्ति का उद्देश्य किसी देश की आर्थिक सफलता को प्रमाणित करना नहीं, बल्कि कर्ज से प्रभावित देशों को एक साझा मंच उपलब्ध कराना है।
पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने, भुगतान दायित्व पूरे करने और वित्तीय सहायता पर निर्भरता घटाने की चुनौती अब भी बनी हुई है। वहीं, Borrowers’ Platform के सामने कर्जदार देशों के बीच सहयोग को प्रभावी बनाने की जिम्मेदारी है।
भारत के लिए भी इस पहल पर नजर रखना उपयोगी होगा, क्योंकि विकासशील देशों के कर्ज, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दे व्यापक महत्व रखते हैं। अंततः इस मंच की सफलता पाकिस्तान की अध्यक्षता से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कर्जदार देशों की वास्तविक समस्याओं के समाधान में कितना योगदान देता है।



