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Politics: SIR के बाद SSR पर कांग्रेस ने उठाए सवाल, इमरान मसूद बोले- मतदाता सूची में गड़बड़ी नहीं थी तो दोबारा संशोधन क्यों?

Politics: कांग्रेस सांसद ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए 17 राज्यों में विशेष संशोधन को लेकर मांगा जवाब, राजनाथ सिंह के बयान पर भी किया पलटवार

Politics: उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद अब विशेष सारांश पुनरीक्षण (SSR) को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने 17 राज्यों में SSR कराए जाने को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि यदि पहले मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में कोई गलती नहीं हुई थी, तो अब दोबारा संशोधन कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है? मसूद ने इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी और राहुल गांधी की ओर से मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर पेश किए गए सबूतों का हवाला दिया।

कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में अनियमितताओं को लेकर उठाए गए सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया है। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग की ओर से 17 राज्यों में SSR कराए जाने का फैसला पहले की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, ये आरोप इमरान मसूद के हैं। मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और चुनाव आयोग की कार्रवाई के संबंध में संबंधित आधिकारिक पक्ष की पुष्टि के बिना इन दावों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

राजनाथ सिंह के बयान पर इमरान मसूद का पलटवार

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से चुनावी प्रक्रिया और राहुल गांधी के आरोपों को लेकर दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए इमरान मसूद ने कहा कि वह राजनाथ सिंह का सम्मान करते हैं, लेकिन राहुल गांधी की ओर से सार्वजनिक रूप से रखे गए तथ्यों और दस्तावेजों पर भी चर्चा होनी चाहिए।

मसूद के मुताबिक, राहुल गांधी ने 25 नवंबर को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मतदाता सूची से संबंधित कथित अनियमितताओं के उदाहरण पेश किए थे। उन्होंने दावा किया कि कुछ मामलों में एक ही घर के पते पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम दर्ज होने और ब्राजील की एक मॉडल की तस्वीर मतदाता सूची में इस्तेमाल किए जाने से जुड़े उदाहरण सामने रखे गए थे।

कांग्रेस सांसद ने कहा कि इन आरोपों को नजरअंदाज करने के बजाय उनकी जांच और स्पष्टीकरण होना चाहिए। उन्होंने भाजपा और चुनाव आयोग के बीच गठजोड़ होने का भी आरोप लगाया। यह आरोप राजनीतिक विवाद का हिस्सा है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री में नहीं दी गई है।

‘गलती नहीं हुई तो दोबारा SSR कराने की जरूरत क्यों?’

इमरान मसूद ने अपने बयान में मतदाता सूची के विशेष संशोधन की प्रक्रिया को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठाया कि यदि पहले की प्रक्रिया सही थी, तो कुछ ही महीनों के भीतर दोबारा संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी।

उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग द्वारा 17 राज्यों में SSR कराए जाने का निर्णय इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाता है। मसूद के अनुसार, यदि मतदाता सूची में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं थी, तो संशोधन की जरूरत और उसके पीछे के कारणों को स्पष्ट किया जाना चाहिए।

कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव और नामों को हटाने की प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने फॉर्म-6 में किए गए कथित बदलावों पर भी सवाल उठाए। हालांकि, फॉर्म-6 से जुड़े नियमों, संशोधनों और उनके इस्तेमाल की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों का परीक्षण जरूरी है।

मसूद का कहना है कि मतदाता सूची से जुड़े विवाद में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। उनके मुताबिक, यदि किसी प्रक्रिया में त्रुटियां हुई हैं, तो उन्हें दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में मामला उठने का भी किया उल्लेख

मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाए जाने का जिक्र करते हुए इमरान मसूद ने कहा कि संबंधित पक्षों को अदालत में सवालों का जवाब देना पड़ सकता है। उन्होंने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और संशोधन की प्रक्रिया को लेकर भी चिंता जताई।

मसूद ने दावा किया कि बड़ी संख्या में लोगों के स्थान बदलने या मृत्यु होने के आधार पर नामों में बदलाव किए जाने की बात कही गई है, लेकिन उनके अनुसार इन आंकड़ों और प्रक्रियाओं को लेकर स्पष्टीकरण जरूरी है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फॉर्म-6 में किए गए कुछ बदलाव निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं थे।

इन बयानों के संदर्भ में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी मामले का सुप्रीम कोर्ट में उठना अपने आप में आरोपों के सही साबित होने का प्रमाण नहीं है। मामले की वास्तविक स्थिति, अदालत में दर्ज कार्यवाही और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर ही कानूनी निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

पश्चिम बंगाल में नाम हटाए जाने और अपीलों का दिया उदाहरण

इमरान मसूद ने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहां मतदाता सूची से 92 लाख लोगों के नाम हटाए गए और 90 प्रतिशत से अधिक लोग अपील के लिए पहुंचे। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि बड़ी संख्या में प्रभावित मतदाताओं की अपील स्वीकार होती है और उनके नाम बहाल किए जाते हैं, तो नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कांग्रेस सांसद ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने या उसमें बदलाव करने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रह जाएं। उनके मुताबिक, इस पूरे मामले में दस्तावेजों और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

हालांकि, पश्चिम बंगाल में नाम हटाए जाने, अपील करने वाले लोगों की संख्या और अपीलों के नतीजों से संबंधित आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। अपील दाखिल करने और उसे स्वीकार किए जाने की प्रक्रियाएं अलग-अलग होती हैं। इसलिए अंतिम स्थिति संबंधित निर्वाचन अधिकारियों के रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगी।

‘2029 तय है’, सरकार को लेकर भी की टिप्पणी

इमरान मसूद ने मतदाता सूची विवाद को संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जोड़ते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं और इन संस्थाओं की निष्पक्षता बनाए रखना लोकतंत्र के लिए जरूरी है।

कांग्रेस सांसद ने कहा कि लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं और मौजूदा सरकार को भी जनता के सामने जवाब देना होगा। उन्होंने वर्ष 2029 के राजनीतिक बदलाव का दावा करते हुए कहा कि सरकार को अपने फैसलों और कामकाज के लिए जवाबदेह होना चाहिए। उन्होंने यह संभावना भी जताई कि सरकार उससे पहले इस्तीफा देने का फैसला कर सकती है।

मसूद की ये टिप्पणियां राजनीतिक बयान हैं। वर्ष 2029 में सत्ता परिवर्तन या उससे पहले सरकार के इस्तीफे को लेकर उन्होंने जो बातें कही हैं, वे उनके राजनीतिक आकलन को दर्शाती हैं, न कि किसी निश्चित घटनाक्रम की पुष्टि करती हैं।

साक्षी महाराज के बयान पर कश्मीरी पंडितों का मुद्दा उठाया

इमरान मसूद ने भाजपा सांसद साक्षी महाराज के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद की स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास, आवास और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

मसूद ने दावा किया कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा, पुनर्वास और संपत्ति खरीदने से जुड़े मुद्दों को लेकर किए गए दावों की जमीनी स्थिति की जांच की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि विस्थापित कश्मीरी पंडितों की वापसी और वहां स्थायी रूप से बसने के संबंध में कितनी प्रगति हुई है।

उनके बयान में जम्मू-कश्मीर में संपत्ति खरीदने और कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास को लेकर कई दावे शामिल थे। इन दावों की पुष्टि के लिए सरकारी आंकड़ों, पुनर्वास योजनाओं की स्थिति और संबंधित विभागों की जानकारी का अलग से परीक्षण जरूरी है।

CJP के तिरंगा मार्च और मदन राठौड़ के बयान पर भी प्रतिक्रिया

इमरान मसूद ने CJP के तिरंगा मार्च से पहले सेंट्रल पार्क बंद किए जाने के मुद्दे पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस घटनाक्रम को राजनीतिक बदलाव से जोड़ते हुए राहुल गांधी का उल्लेख किया। मसूद ने कहा कि देश में परिवर्तन का दौर चल रहा है और उनके अनुसार भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रियाएं इसी राजनीतिक माहौल को दर्शाती हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर उठाए गए सवालों के कारण भाजपा के नेता दबाव में हैं। ये टिप्पणियां कांग्रेस सांसद की राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं।

राजस्थान भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ के पाकिस्तान को लेकर दिए गए बयान पर भी मसूद ने अपनी राय रखी। उन्होंने पाकिस्तान के संदर्भ में धार्मिक पहचान के आधार पर नफरत किए जाने की आलोचना की, साथ ही पाकिस्तान की नीतियों और उसके व्यवहार को लेकर नकारात्मक टिप्पणी भी की। उनके इस बयान ने विवाद के दायरे को मतदाता सूची से आगे बढ़ाकर भारत-पाकिस्तान संबंधों और राजनीतिक बयानबाजी तक पहुंचा दिया।

मतदाता सूची का मुद्दा बना राजनीतिक बहस का केंद्र

SIR के बाद SSR को लेकर उठे सवालों ने मतदाता सूची की शुद्धता, संशोधन प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की भूमिका पर राजनीतिक बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए भाजपा और चुनाव आयोग के बीच गठजोड़ होने का आरोप लगाया है, जबकि उनके बयान में राहुल गांधी की ओर से पहले लगाए गए आरोपों का भी उल्लेख किया गया है।

अब इस विवाद में आधिकारिक आंकड़ों, चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण और संबंधित कानूनी कार्यवाही की स्थिति महत्वपूर्ण होगी। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया के बारे में तथ्यात्मक निष्कर्ष संबंधित रिकॉर्ड और लागू नियमों के आधार पर ही निकाले जा सकते हैं।

फिलहाल इमरान मसूद के बयान ने SIR और SSR को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। आगे यह देखना होगा कि चुनाव आयोग इन सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में आधिकारिक स्तर पर क्या स्थिति सामने आती है।

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