Neet Paper Leak:चूक तो हुई! समय रहते संवाद होता तो संभल जाती स्थिति

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद है। परीक्षा प्रणाली, युवाओं के विश्वास और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर शाश्वत तिवारी का विश्लेषण।

Neet Paper Leak: आज आवश्यकता किसी की जीत या हार घोषित करने की नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा प्रणाली बनाने की है, जिसमें प्रतिभा जीते, ईमानदारी जीते और भारत का युवा यह महसूस करे कि उसकी मेहनत सुरक्षित है। जब शासन सुनता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। जब शासन केवल सुनाने लगता है, तब सड़कें बोलने लगती हैं। इसलिए समय की सबसे बड़ी मांग यही है— संवाद, संवेदनशीलता और संस्थागत सुधार।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत “संवाद” है।

इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ा सबक यही मिलता है कि चूक हुई, और वह संवाद की चूक थी। यदि प्रारंभिक स्तर पर संवेदनशील बातचीत होती, यदि छात्रों की आशंकाओं का समय रहते उत्तर दिया जाता और यदि पारदर्शिता के साथ कार्रवाई दिखाई देती, तो शायद दिल्ली की सड़कें संघर्ष का प्रतीक न बनतीं।

दिल्ली की सड़कों पर उमड़ा छात्र आक्रोश, संसद की ओर बढ़ते हजारों युवाओं का मार्च, सोनम वांगचुक का लंबा आमरण अनशन और पुलिस के साथ टकराव— ये घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं। ये उस गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति हैं, जो वर्षों से देश की परीक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रणाली और शासन की जवाबदेही को लेकर युवाओं के भीतर पनप रहा है। हाल के दिनों में NEET परीक्षा को लेकर उठे विवाद, विरोध-प्रदर्शन और संसद के मानसून सत्र से पहले हुए घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि संवाद समय पर न हो, तो लोकतंत्र में असंतोष सड़क पर उतर आता है।

भारत विश्व का सबसे युवा देश बनने की ओर अग्रसर है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और हर वर्ष करोड़ों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। केवल NEET-UG ही देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है, जिसमें इस वर्ष भी लगभग 20 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने भाग लिया।

यही कारण है कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता पर उठने वाला हर प्रश्न केवल एक परीक्षा का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि करोड़ों परिवारों के विश्वास का प्रश्न बन जाता है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में अनेक प्रतियोगी परीक्षाएँ पेपर लीक, नकल, तकनीकी गड़बड़ियों और भर्ती में विलंब के आरोपों से घिरी रही हैं। इससे युवाओं में यह भावना गहरी हुई है कि उनकी वर्षों की मेहनत कुछ लोगों की बेईमानी की भेंट चढ़ सकती है।

लोकतंत्र में विरोध असामान्य नहीं होता। असामान्य तब होता है, जब सरकार और जनता के बीच संवाद समाप्त हो जाए। यदि छात्रों की प्रारंभिक शिकायतों पर गंभीरता से चर्चा होती, यदि पारदर्शी जांच की दिशा में विश्वास पैदा किया जाता, तो शायद स्थिति संसद मार्च तक नहीं पहुँचती।

यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी लोकतंत्र में हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, पुलिस पर हमला करना या कानून हाथ में लेना किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करता है। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि शांतिपूर्ण विरोध को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानकर दबाने का प्रयास भी लोकतांत्रिक समाधान नहीं हो सकता।

भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण एवं निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, परंतु लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि सरकार आलोचना को सुनने का कितना साहस रखती है।

सोनम वांगचुक का आंदोलन भी इसी बहस का हिस्सा बन गया। उनके लंबे अनशन ने परीक्षा प्रणाली, युवाओं के भविष्य और जवाबदेही जैसे प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया। हालिया घटनाक्रम में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के आश्वासन तथा राजनीतिक स्तर पर महत्वपूर्ण निर्णयों ने यह संकेत दिया कि अंततः समाधान संवाद की मेज पर ही तलाशा गया।

भारत में पेपर लीक अब केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संगठित आर्थिक अपराध का स्वरूप ले चुका है। जब प्रश्नपत्र करोड़ों रुपये में बिकने लगें और कुछ लोग लाखों विद्यार्थियों की मेहनत पर पानी फेर दें, तब यह केवल परीक्षा नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रतिभा के साथ विश्वासघात है।

Neet Paper Leak: संवाद की कमी ने कैसे बढ़ाया छात्र आंदोलन? लोकतंत्र, युवाओं और शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सबक

सरकार ने हाल के वर्षों में पेपर लीक रोकने के लिए कानूनों को और कठोर बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। किंतु कानून तभी प्रभावी होगा, जब उसके साथ निष्पक्ष जांच, त्वरित अभियोजन और दोषियों को समयबद्ध सजा भी सुनिश्चित हो।

दुनिया के कई देशों ने परीक्षा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और ब्रिटेन में प्रश्नपत्रों की डिजिटल सुरक्षा, बहु-स्तरीय एन्क्रिप्शन, निगरानी और कठोर दंड व्यवस्था के कारण बड़े स्तर पर पेपर लीक की घटनाएँ अत्यंत दुर्लभ हैं।

भारत भी तकनीक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के माध्यम से ऐसी व्यवस्था विकसित कर सकता है।

यह भी समझना होगा कि बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव युवाओं को मानसिक रूप से प्रभावित करता है। वर्षों की तैयारी, आर्थिक बोझ और अनिश्चित भविष्य के बीच यदि परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, तो स्वाभाविक रूप से असंतोष जन्म लेता है। इसलिए परीक्षा सुधार केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकता भी है।

राजनीतिक दलों को भी इस विषय पर संयम दिखाना चाहिए। छात्रों की पीड़ा को केवल राजनीतिक हथियार बनाना समाधान नहीं है। विपक्ष का दायित्व है कि वह रचनात्मक सुझाव दे, जबकि सरकार का दायित्व है कि वह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता का परिचय दे।

आज आवश्यकता है कि राष्ट्रीय परीक्षा प्राधिकरणों को और अधिक स्वतंत्र, तकनीकी रूप से सक्षम तथा जवाबदेह बनाया जाए। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, डिजिटल ऑडिट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, समयबद्ध जांच और दोषियों की संपत्ति जब्ती जैसे कठोर उपायों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

भारत का भविष्य उसके युवा हैं। यदि युवाओं का विश्वास संस्थाओं से उठ गया, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। लोकतंत्र की असली शक्ति पुलिस की बैरिकेडिंग में नहीं, बल्कि विश्वास की पुलिया बनाने में है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहना चाहिए। यह भरोसा केवल कानून से नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और संवाद से अर्जित होता है।


(लेखक: शाश्वत तिवारी, विश्लेषक, विचारक एवं स्वतंत्र पत्रकार)

Related Articles

Back to top button