शादी से इनकार के बाद ब्रेकअप और सुसाइड से ही नहीं बनेगा उकसाने का केस, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी से इनकार या ब्रेकअप के बाद आत्महत्या होने से ही प्रेमी पर आत्महत्या के लिए उकसाने का केस नहीं बनता। इसके लिए उकसावे के ठोस सबूत जरूरी हैं।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शादी से इनकार और ब्रेकअप के बाद आत्महत्या से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ शादी से इनकार करना या रिश्ता खत्म करना अपने आप आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया था और उसके समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।

यह मामला तेलंगाना का है। एक युवती ने अपने प्रेमी की ओर से शादी से इनकार किए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद पुलिस ने प्रेमी और उसके परिवार के पांच अन्य सदस्यों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित मामला दर्ज किया था।

मामला पहले तेलंगाना हाईकोर्ट पहुंचा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विनोद चंद्रन की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी पक्ष के खिलाफ दर्ज केस को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी रिश्ते का खत्म होना और किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाना दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत के मुताबिक, ब्रेकअप के बाद आत्महत्या हो जाने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दूसरे व्यक्ति ने आत्महत्या के लिए उकसाया था।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप को साबित करने के लिए जरूरी साक्ष्य होना चाहिए। केवल यह तथ्य कि शादी से इनकार के बाद रिश्ता टूट गया और उसके बाद आत्महत्या हुई, अपने आप में उकसावे का पर्याप्त आधार नहीं है।

‘ब्रेकअप को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी के लिए मना करना या रिश्ता खत्म करना एक बात है, जबकि आत्महत्या के लिए उकसाना अलग कानूनी अवधारणा है।

अदालत के सामने ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं रखा गया जिससे यह साबित हो कि ब्रेकअप के बाद प्रेमी ने युवती को आत्महत्या करने के लिए उकसाया था।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रेमी और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया।

करीब 3 महीने तक रिलेशनशिप में थे दोनों

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले के घटनाक्रम पर भी गौर किया। युवती और आरोपी युवक करीब तीन महीने तक रिलेशनशिप में थे। बाद में युवक की मां ने शादी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद रिश्ता आगे नहीं बढ़ सका और युवती ने आत्महत्या कर ली। घटना के बाद युवक और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री से यह स्थापित नहीं होता कि युवक को यह जानकारी थी कि रिश्ता खत्म होने के बाद युवती आत्महत्या जैसा कदम उठा सकती है या उसने उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया था।

आत्महत्या के आंकड़ों का क्या है आंकड़ा?

उपलब्ध NCRB आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में भारत में कुल 1,70,746 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। इनमें 7,850 मामले प्रेम संबंधों से जुड़े बताए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि किसी आत्महत्या के पीछे किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए केवल घटनाओं का क्रम पर्याप्त नहीं होता। अदालत को यह भी देखना होता है कि आरोपी की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़ा आवश्यक कानूनी आधार और साक्ष्य मौजूद है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सार

  • शादी से इनकार करना अपने आप आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है।
  • ब्रेकअप के बाद आत्महत्या होने मात्र से प्रेमी पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
  • आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप के समर्थन में आवश्यक साक्ष्य होना जरूरी है।
  • मामले में ऐसा सबूत नहीं मिला जिससे आरोपी द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने की बात साबित हो।
  • सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज केस को रद्द कर दिया।

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