Abhijeet Dipke School Theek Karo Abhiyan: अभिजीत दीपके का हिंगोली में प्रदर्शन, ग्रामीण स्कूलों की बदहाली पर उठाए सवाल

अभिजीत दीपके ने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और मूलभूत सुविधाओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने दो अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति समेत शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग की।

Abhijeet Dipke School Theek Karo Abhiyan: महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू किया है। ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत दीपके और उनके समर्थक गांवों में स्कूलों की मूलभूत समस्याओं को उजागर कर रहे हैं और सरकार से शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं। इस अभियान का उद्देश्य ग्रामीण छात्रों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं उपलब्ध कराना बताया जा रहा है।

हिंगोली में चल रहे प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दीपके ने एक प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों की शिकायतों के आधार पर यह मुद्दा उठाया गया है कि प्रधानाचार्य कथित तौर पर नशे की हालत में स्कूल आते थे। दीपके ने दावा किया कि इस मामले को लेकर ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासन से कार्रवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि संबंधित प्रधानाचार्य को उनके पद से हटा दिया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आंदोलन केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में सुधार के लिए है।

दीपके ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र के इस स्कूल में शिक्षकों की भारी कमी है। उन्होंने दो अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति की मांग करते हुए कहा कि जब तक स्कूल में पर्याप्त शिक्षक नहीं होंगे, तब तक बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती रहेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं तो ग्रामीणों का प्रदर्शन जारी रहेगा। उनका कहना है कि शिक्षा के अधिकार को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता और सरकार को जमीनी स्तर पर सुधार सुनिश्चित करना होगा।

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान की शुरुआत अभिजीत दीपके ने अपने पैतृक गांव से की थी। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के कई गांवों में सरकारी स्कूलों की हालत चिंताजनक है। कहीं शिक्षकों की कमी है तो कहीं भवन जर्जर अवस्था में हैं। कई स्कूलों में पीने के पानी, शौचालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। उनका आरोप है कि वर्षों से सत्ता में रही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने सरकारी स्कूलों की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

दीपके का कहना है कि ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शहरों और गांवों के छात्रों के बीच शिक्षा के अवसरों में बड़ा अंतर दिखाई देता है। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को जहां आधुनिक सुविधाएं और बेहतर संसाधन मिलते हैं, वहीं सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे कई बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करते हैं। यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था में असमानता को बढ़ावा देती है।

उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को अब शिक्षा के मुद्दे पर खुलकर सवाल पूछने चाहिए। उनके अनुसार शिक्षा किसी भी समाज के विकास की सबसे महत्वपूर्ण नींव होती है और यदि स्कूलों की स्थिति खराब होगी तो भविष्य की पीढ़ियां प्रभावित होंगी। उन्होंने कहा कि केवल चुनावी वादों से काम नहीं चलेगा, बल्कि सरकारों को स्कूलों की वास्तविक स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

अभिजीत दीपके ने निजी स्कूलों की फीस को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई निजी स्कूल मनमाने ढंग से फीस बढ़ा रहे हैं, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। उन्होंने मांग की कि सरकार निजी स्कूलों की फीस के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनाए, ताकि अभिभावकों को राहत मिल सके। उनका मानना है कि शिक्षा को व्यवसाय के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।

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स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने पैतृक गांव संतुक पिंपरी पहुंचने से पहले दीपके ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर राजनीतिक दलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि चाहे किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, सरकारी स्कूलों के ढांचे और शिक्षा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। उन्होंने दावा किया कि अब आम लोग भी इस मुद्दे को गंभीरता से समझने लगे हैं और शिक्षा को राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बनाया जाना चाहिए।

दीपके का यह अभियान धीरे-धीरे चर्चा का विषय बनता जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में सुधार होता है तो हजारों बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है। वहीं आलोचकों का मानना है कि केवल आंदोलन करने के बजाय सरकार और प्रशासन के साथ समन्वय बनाकर समाधान तलाशना अधिक प्रभावी होगा। हालांकि इस बहस के बीच एक बात स्पष्ट है कि शिक्षा और सरकारी स्कूलों की स्थिति का मुद्दा फिर से सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।

फिलहाल हिंगोली में चल रहा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ग्रामीण स्कूलों की समस्याओं को उजागर करने का प्रयास कर रहा है। अब यह देखना होगा कि प्रशासन और राज्य सरकार इस आंदोलन की मांगों पर क्या कदम उठाते हैं और क्या ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में अपेक्षित सुधार देखने को मिलता है।

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