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बंगाल में ‘खेला’ पार्ट-2? TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह, ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ते असंतोष और कुछ नेताओं की गतिविधियों ने पार्टी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे ‘खेला पार्ट-2’ के रूप में देखा जा रहा है, जहां पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।

हाल ही में दिल्ली में TMC के कुछ सांसदों की भाजपा के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई मुलाकात ने राजनीतिक अटकलों को हवा दे दी। हालांकि पार्टी की ओर से इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इसे अलग नजरिए से देख रहे हैं।

बैठक में शामिल नेताओं में राज्यसभा के पूर्व सदस्य सुखेंदु शेखर रॉय, जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, अरूप चक्रवर्ती और कालीपदा सोरेन जैसे नाम चर्चा में रहे। बताया जा रहा है कि इन नेताओं ने केंद्र और राज्य के बीच विकास संबंधी मुद्दों पर बातचीत की।

इस बीच, सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा भी चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने अपने इस्तीफे में पार्टी के भीतर कार्यशैली, भ्रष्टाचार और असहमति की आवाज को लेकर सवाल उठाए थे। उनके आरोपों ने TMC के अंदरूनी माहौल को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों से पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। कई नेताओं और विधायकों के नेतृत्व को लेकर नाराज होने की चर्चाएं लगातार सामने आती रही हैं। ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई कुछ बैठकों में कई नेताओं की अनुपस्थिति ने भी इन अटकलों को बल दिया है।

इसी बीच, ऋतब्रत बंद्योपाध्याय का नाम भी चर्चा में है। माना जा रहा है कि वे पार्टी के असंतुष्ट वर्ग की आवाज बनकर उभर रहे हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इस तरह के दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

दिल्ली में TMC नेताओं की सक्रियता और लगातार हो रही बैठकों के बीच फिरहाद हाकिम की कुछ नेताओं से मुलाकात को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी नेतृत्व स्थिति को संभालने और असंतुष्ट नेताओं को मनाने की कोशिश कर रहा है।

वहीं, ममता बनर्जी की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। दिल्ली दौरे के दौरान उन्होंने मीडिया से दूरी बनाए रखी और किसी भी विवाद पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से परहेज किया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में TMC के भीतर की स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। यदि असंतोष बढ़ता है तो पार्टी के लिए चुनौती खड़ी हो सकती है, वहीं नेतृत्व यदि समय रहते संवाद स्थापित करता है तो हालात नियंत्रित भी हो सकते हैं।

फिलहाल बंगाल की राजनीति में नजरें TMC के अगले कदम पर टिकी हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इस अंदरूनी संकट से कैसे निपटती है।

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