CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, SIR और वोटर लिस्ट को लेकर SIT जांच की मांग

याचिका में दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों, Form 6 में बदलाव और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठाए गए हैं

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े कुछ फैसलों और मतदाता सूची में किए गए कथित बदलावों को लेकर जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि निर्वाचन आयोग में कुछ फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। इसके आधार पर ऐसे फैसलों को निरस्त करने और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है।

याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई है। इसमें CEC ज्ञानेश कुमार के अलावा डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और ECI की IT प्रमुख सीमा खन्ना के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग का उल्लेख है। याचिका में कथित तौर पर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई की मांग की गई है।

SIR को लेकर क्या है पूरा विवाद?

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के जरिए मतदाता सूचियों की समीक्षा और संशोधन किया जा रहा है। इसी प्रक्रिया को लेकर पिछले कुछ दिनों से निर्वाचन आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

23 सितंबर को प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने के साथ-साथ Form 6, मतदाता डेटा और निर्वाचन आयोग के IT सिस्टम से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया था।

इसके बाद इस मामले ने राजनीतिक और कानूनी बहस का रूप ले लिया। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों की उस व्याख्या को खारिज किया है जिसमें आंतरिक आपत्तियों को आयोग के अंतिम फैसलों में असहमति के रूप में पेश किया गया। आयोग का कहना है कि बहु-सदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय, टिप्पणियां और सवाल आंतरिक जांच एवं संतुलन का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने का दावा

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की SIT जांच की मांग भी की गई है। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम किस प्रक्रिया के तहत हटाए गए और इस पूरी प्रक्रिया में संबंधित अधिकारियों की भूमिका क्या रही।

हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा याचिका में लगाए गए आरोप और संबंधित रिपोर्टिंग का हिस्सा है। इसे ऐसे नहीं लिखा जा सकता कि 13 करोड़ पात्र मतदाताओं के नाम स्थायी रूप से वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम प्रभावित हुए हैं।

Form 6 में बदलाव और डेटा केंद्रीकरण पर भी सवाल

याचिका में मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में कथित बदलाव और मतदाता सूची के डेटा को केंद्रीकृत किए जाने को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन बदलावों से पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर होने का खतरा पैदा हुआ।

याचिका में ऐसे फैसलों को अवैध घोषित करने और पुराने Form 6 को बहाल करने की मांग भी की गई है। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने निर्वाचन आयोग से जुड़े कुछ अधिकारियों के खिलाफ जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत कार्रवाई की मांग की है।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का मामला

इस पूरे विवाद का एक अहम हिस्सा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित आपत्तियां हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा तक पहुंच से जुड़े कई फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने केंद्रीय स्तर पर मतदाता डेटा के नियंत्रण और Electoral Registration Officers की शक्तियों को लेकर सवाल उठाए थे।

हालांकि, निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि आंतरिक स्तर पर अलग-अलग राय सामने आना संस्था के कामकाज का हिस्सा है। आयोग के अनुसार अंतिम आदेश और फैसले निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए और SIR से जुड़े निर्णयों को सभी चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी।

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अब सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में SIR से जुड़े कथित फैसलों की वैधता की जांच, विवादित फैसलों को निरस्त करने, मतदाता सूची से जुड़े मामलों की SIT जांच और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है।

फिलहाल ये सभी मांगें याचिका में किए गए अनुरोध हैं। इन आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है। ऐसे में याचिका में लगाए गए आरोपों और निर्वाचन आयोग के आधिकारिक पक्ष को अलग-अलग समझना जरूरी है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत यह तय करेगी कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर किस तरह की न्यायिक जांच या अन्य कार्रवाई की आवश्यकता है।

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