National Political News: चौधरी चरण सिंह पुण्यतिथि! बिना किसी राजनीतिक विरासत के किसान के बेटे ने कैसे तय किया PM बनने तक का सफर
किसान राजनीति के सबसे बड़े चेहरे थे चौधरी चरण सिंह
National Political News: भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे हुए हैं, जिन्होंने सत्ता को सिर्फ राजनीति का माध्यम नहीं बल्कि समाज बदलने का हथियार बनाया। चौधरी चरण सिंह उन्हीं नेताओं में शामिल थे। 29 मई को उनकी पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें किसान नेता, जमीन से जुड़े राजनेता और ग्रामीण भारत की आवाज के रूप में याद कर रहा है।
एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेने वाले चौधरी चरण सिंह ने बिना किसी राजनीतिक बैकग्राउंड और बिना किसी बड़े राजनीतिक आका के देश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री बनने तक का उनका सफर संघर्ष, ईमानदारी और किसानों के प्रति समर्पण की मिसाल माना जाता है।
किसान परिवार में जन्म, गांव की मिट्टी से मिला जुड़ाव
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को मेरठ जिले के नूरपुर गांव में हुआ था, जो अब हापुड़ जिले में आता है। उनके पिता मीर सिंह एक साधारण किसान थे। बचपन से ही उन्होंने खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन की परेशानियों को करीब से देखा। यही वजह रही कि आगे चलकर किसानों के मुद्दे उनकी राजनीति का केंद्र बन गए।
उन्होंने आगरा कॉलेज से विज्ञान में स्नातक किया, फिर इतिहास में एमए और बाद में कानून की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही वे महात्मा गांधी और सरदार पटेल के विचारों से प्रभावित हुए और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए।
आजादी की लड़ाई में कई बार गए जेल
चौधरी चरण सिंह ने नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। लेकिन उन्होंने कभी समझौता नहीं किया।
स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने राजनीति को सत्ता नहीं बल्कि समाज सेवा का माध्यम माना। खासतौर पर किसानों और ग्रामीण भारत के लिए उनके फैसलों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।
यूपी में खत्म किया जमींदारी सिस्टम
उत्तर प्रदेश के कृषि और राजस्व मंत्री रहते हुए चौधरी चरण सिंह ने ऐतिहासिक भूमि सुधार कानून लागू कराया। ‘जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम’ को उनके सबसे बड़े योगदानों में गिना जाता है।
इस फैसले ने गांवों में वर्षों से चले आ रहे जमींदारी सिस्टम को खत्म करने का रास्ता साफ किया और लाखों किसानों को जमीन का अधिकार मिला। यही वजह रही कि ग्रामीण इलाकों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ती चली गई।
बने यूपी के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री
साल 1967 भारतीय राजनीति के लिए बड़ा मोड़ साबित हुआ। चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़कर भारतीय क्रांति दल का गठन किया और उत्तर प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने।
उन्होंने किसानों, पिछड़ी जातियों और ग्रामीण समाज को राजनीतिक ताकत में बदल दिया। ‘अजगर’ यानी अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत समुदायों का सामाजिक समीकरण तैयार कर उन्होंने उत्तर भारत की राजनीति को नई दिशा दी।
प्रधानमंत्री बने, लेकिन सत्ता से ज्यादा गांवों पर रहा फोकस
आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी सरकार में चौधरी चरण सिंह ने गृह मंत्री और वित्त मंत्री के तौर पर काम किया। बाद में 28 जुलाई 1979 को उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
हालांकि उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने ग्रामीण विकास और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने का काम किया। माना जाता है कि नाबार्ड जैसी संस्थाओं की सोच को मजबूत आधार देने में उनकी बड़ी भूमिका रही।
किसान राजनीति की आज भी मिसाल
29 मई 1987 को चौधरी चरण सिंह का निधन हो गया। दिल्ली में यमुना किनारे उनकी समाधि को ‘किसान घाट’ नाम दिया गया। हर साल 23 दिसंबर को उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया। 2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनके पोते जयंत चौधरी को सौंपा।
चौधरी चरण सिंह सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि ग्रामीण भारत की आवाज थे। उन्होंने यह साबित किया कि बिना राजनीतिक विरासत और बड़े परिवार के समर्थन के भी देश की राजनीति में सर्वोच्च स्थान हासिल किया जा सकता है। किसानों के अधिकार, गांवों का विकास और सामाजिक न्याय उनकी राजनीति की सबसे बड़ी पहचान रहे, जिसकी चर्चा आज भी भारतीय राजनीति में होती है।



