International News: क्या बदल रही है भारत की अमेरिका नीति? रणनीतिक दोस्ती पर उठने लगे नए सवाल
अमेरिका के कई फैसलों ने बढ़ाई नई दिल्ली की चिंता, राष्ट्रीय हितों को लेकर भारत का रुख और सख्त
International News: भारत और अमेरिका के रिश्तों को पिछले दो दशकों में रणनीतिक साझेदारी का नया नाम दिया गया है। रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी, सैन्य अभ्यास और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में साझा रणनीति को लेकर दोनों देशों के बीच लगातार नजदीकियां बढ़ी हैं। लेकिन हाल के वर्षों में अमेरिका के कुछ फैसलों ने भारत के नीति-निर्माताओं और सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल ही में अमेरिका द्वारा आठ वर्षों बाद अपने “इंडो-पैसिफिक कमांड” का नाम बदलकर फिर से “पैसिफिक कमांड” किए जाने को कई भारतीय विशेषज्ञ केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह कदम अमेरिका की बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत हो सकता है। ऐसे में भारत के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि क्या अमेरिका वास्तव में भारत को अपनी विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति का केंद्रीय भाग मानता है या फिर यह केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित है।
अमेरिका के कुछ फैसलों ने बढ़ाई चिंता
विश्लेषकों के अनुसार भारत-अमेरिका संबंधों में समय-समय पर ऐसे कई घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने नई दिल्ली को असहज किया। वर्ष 2019 में अमेरिका ने भारत को दी गई जीएसपी (Generalized System of Preferences) सुविधा समाप्त कर दी थी। इस फैसले से भारतीय निर्यातकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और इसे दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में बड़ा झटका माना गया।
इसके बाद वर्ष 2021 में अमेरिकी नौसेना ने लक्षद्वीप के निकट भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में बिना पूर्व अनुमति “फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन” संचालित किया। अमेरिकी नौसेना ने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि इस अभियान के लिए भारत की मंजूरी नहीं ली गई थी। इस घटना ने भारतीय रणनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए।
रूस और तेल खरीद को लेकर भी बना दबाव
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद को लेकर अमेरिका की ओर से लगातार दबाव और आलोचना देखने को मिली। भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए तेल आयात जारी रखा, लेकिन इस दौरान अमेरिकी बयानों ने यह संदेश दिया कि वॉशिंगटन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को तभी तक स्वीकार करता है, जब तक वह अमेरिकी हितों से टकराती नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम ने भारत के भीतर यह सोच मजबूत की कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होने चाहिए।
ट्रंप प्रशासन के फैसलों पर भी उठे सवाल
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान भारत पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ, व्यापारिक दबाव और पाकिस्तान को लेकर दिए गए कुछ सकारात्मक संकेतों ने भी नई दिल्ली की चिंता बढ़ाई है। भारतीय सुरक्षा और कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठने लगा है कि यदि भारत अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक साझेदार है तो फिर पाकिस्तान के साथ बढ़ती अमेरिकी नजदीकियों को कैसे देखा जाए।
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विशेष रूप से पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ अमेरिकी अधिकारियों की बढ़ती मुलाकातों और संवाद को भारत में गंभीरता से देखा जा रहा है। हालांकि भारत यह भी समझता है कि अमेरिका अपने क्षेत्रीय हितों के कारण पाकिस्तान से पूरी तरह दूरी नहीं बना सकता।
क्या रिश्तों में आएगी दूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि इन मतभेदों के बावजूद भारत और अमेरिका के संबंधों के पटरी से उतरने की संभावना बेहद कम है। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, व्यापार और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। हालांकि अब भारत के नीति-निर्माताओं के बीच यह सोच मजबूत हो रही है कि अमेरिका के सार्वजनिक बयानों और वास्तविक रणनीतिक निर्णयों को अलग-अलग नजरिए से देखा जाए।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है और आने वाले समय में भी नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अमेरिका सहित सभी वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करेगी।
कुल मिलाकर भारत-अमेरिका संबंध आज भी मजबूत हैं, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्रता से अधिक महत्व राष्ट्रीय हितों का होता है।



