Maharashtra Politics: देवेंद्र फडणवीस के हाथों में बढ़ी सत्ता की ताकत, मंत्रियों के फैसलों पर भी रख सकेंगे नजर
महाराष्ट्र सरकार ने 51 साल पुराने कामकाज के नियमों में बदलाव किया है। नए प्रावधानों के तहत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को मंत्रियों और विभागों के फैसलों की समीक्षा करने के साथ जरूरत पड़ने पर उन्हें बदलने या रद्द करने का अधिकार मिलेगा।
Maharashtra Politics: महाराष्ट्र में सरकारी कामकाज को लेकर नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। राज्य सरकार ने 1975 से लागू नियमों की जगह महाराष्ट्र सरकार के कामकाज के नियम, 2026 को लागू किया है। नए नियमों के बाद मुख्यमंत्री के प्रशासनिक अधिकार पहले के मुकाबले ज्यादा स्पष्ट और व्यापक हो गए हैं।
नए प्रावधानों के मुताबिक मुख्यमंत्री किसी भी विभाग से जुड़ी फाइल, रिकॉर्ड या दस्तावेज समीक्षा के लिए अपने पास मंगा सकते हैं। इतना ही नहीं, किसी मंत्री या विभाग की ओर से लिए गए फैसले में बदलाव करने या उसे रद्द करने का अधिकार भी मुख्यमंत्री के पास रहेगा।
हालांकि, मुख्यमंत्री को यह अधिकार बिना किसी प्रक्रिया के नहीं मिलेगा। यदि किसी मंत्री के फैसले को बदला या निरस्त किया जाता है तो उसके पीछे का कारण लिखित रूप में दर्ज करना होगा। इससे फैसलों की प्रक्रिया में जवाबदेही और रिकॉर्ड बनाए रखने का प्रावधान रहेगा।
51 साल बाद बदले सरकार चलाने के नियम
महाराष्ट्र में सरकारी कामकाज से जुड़े पुराने नियम वर्ष 1975 से लागू थे। अगस्त 2026 में राज्य सरकार ने इनमें बदलाव करते हुए नए नियम अधिसूचित किए। बदलाव का सबसे अहम पहलू मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्रियों के अधिकारों से जुड़ा है।
अब मुख्यमंत्री के पास अलग-अलग विभागों के कामकाज की समीक्षा करने और आवश्यकता पड़ने पर मंत्रियों के फैसलों में हस्तक्षेप करने का स्पष्ट प्रावधान है। इसका असर खास तौर पर गठबंधन सरकार में विभागों के बीच फैसले लेने की प्रक्रिया पर दिखाई दे सकता है।
फाइलें सीधे मुख्यमंत्री के पास मंगाई जा सकेंगी
नए नियमों के तहत मुख्यमंत्री किसी भी विभाग से संबंधित दस्तावेज और रिकॉर्ड की समीक्षा कर सकते हैं। संबंधित मंत्री और विभागीय अधिकारी मुख्यमंत्री द्वारा मांगी गई फाइलों को रोक नहीं सकेंगे।
इस व्यवस्था से मुख्यमंत्री कार्यालय को सरकार के अलग-अलग विभागों में लिए जा रहे महत्वपूर्ण फैसलों पर सीधी नजर रखने का अधिकार मिलेगा। हालांकि, किसी फैसले को बदलने के लिए कारण दर्ज करने की शर्त रखी गई है।
पुराने विवाद के बाद सामने आया था अधिकारों का सवाल
मुख्यमंत्री और मंत्री के अधिकारों को लेकर महाराष्ट्र में पहले भी कानूनी विवाद सामने आ चुका है। वर्ष 2022 में एक सहकारी बैंक में भर्ती से जुड़े फैसले को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और विभागीय मंत्री के अधिकारों का मामला अदालत पहुंचा था।
मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने मार्च 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के आदेश को रद्द कर दिया था। अदालत ने उस समय लागू 1975 के नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि मुख्यमंत्री को अपने कैबिनेट मंत्री के फैसले को इस तरह रोकने का अधिकार नहीं था।
अब नए नियमों में मुख्यमंत्री के अधिकारों को स्पष्ट रूप से बढ़ाया गया है। इसी वजह से 2026 के नए प्रावधानों को उस पुराने कानूनी विवाद के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ेगा असर?
महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी भी सत्ता में साझेदार हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री को मंत्रियों के फैसलों की समीक्षा और उन्हें बदलने की शक्ति मिलने से गठबंधन की राजनीति पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
विपक्ष का आरोप है कि नए नियमों से सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ सकता है और सहयोगी दलों के मंत्रियों के अधिकार सीमित हो सकते हैं। वहीं सरकार के नजरिए से देखें तो नए नियम प्रशासनिक समन्वय, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट करने की दिशा में उठाया गया कदम हैं।
फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि नए नियमों के तहत मुख्यमंत्री के पास अब विभागीय फैसलों की समीक्षा और आवश्यक परिस्थितियों में उनमें बदलाव करने का स्पष्ट अधिकार मौजूद रहेगा। इसके लिए लिखित कारण दर्ज करने की व्यवस्था भी रखी गई है।



