Prashant Kishor Bankipur: बांकीपुर जीत के बाद प्रशांत किशोर का बड़ा बयान, बोले- लोग किसी नेता या पार्टी के गुलाम नहीं

जन सुराज प्रमुख ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर शिक्षा, रोजगार और बेहतर शासन को वोट देने की अपील की

Prashant Kishor Bankipur: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत के बाद जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने इसे सिर्फ एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक सोच का संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि अगर मतदाताओं के सामने कोई विश्वसनीय विकल्प हो तो वे जाति, धर्म, पार्टी की परंपरागत निष्ठा और किसी नेता की छवि से ऊपर उठकर शिक्षा, रोजगार और बेहतर शासन को प्राथमिकता दे सकते हैं। प्रशांत किशोर ने कहा कि लोग किसी पार्टी या नेता के गुलाम नहीं हैं।

3 अगस्त को हुए बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज ने जीत दर्ज की। यह सीट लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही थी। पूर्व विधायक और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई थी, जिसके बाद यहां उपचुनाव कराया गया। प्रशांत किशोर के लिए यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उनकी पार्टी की पहली बड़ी चुनावी सफलता मानी जा रही है।

बांकीपुर के नतीजे को लेकर प्रशांत किशोर का कहना है कि यह अचानक मिली सफलता नहीं थी। उनके मुताबिक मतदाताओं के बीच लंबे समय से बदलाव की इच्छा थी और चुनाव में जन सुराज को एक वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के तौर पर स्वीकार किया गया। उन्होंने कहा कि बिहार के लोग अब केवल जातीय समीकरण या परंपरागत राजनीतिक पसंद के आधार पर मतदान करने के बजाय शिक्षा, रोजगार और शासन जैसे मुद्दों पर भी फैसला कर सकते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने कहा कि यदि लोगों को एक विश्वसनीय विकल्प उपलब्ध कराया जाए तो वे किसी पार्टी या नेता के प्रति बंधे हुए नहीं हैं। उनके इस बयान को बिहार की पारंपरिक राजनीति के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य की राजनीति में लंबे समय से जाति और सामाजिक समीकरण चुनावी रणनीति के प्रमुख आधार रहे हैं।

प्रशांत किशोर ने बिहार के विकास को अपनी पार्टी का राष्ट्रीय मिशन बताया। उन्होंने कहा कि देश की करीब 10 प्रतिशत आबादी बिहार में रहती है, लेकिन राज्य गरीबी, बेरोजगारी और पलायन जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। उनके अनुसार जब तक बिहार में आर्थिक और सामाजिक सुधार नहीं होता, तब तक विकसित भारत का लक्ष्य पूरी तरह हासिल करना मुश्किल होगा।

बांकीपुर के विधायक के तौर पर अपनी प्राथमिकताओं पर भी प्रशांत किशोर ने बात की। उन्होंने कहा कि पात्र लोगों को राशन कार्ड, पेंशन और दूसरी सरकारी योजनाओं का लाभ बिना रिश्वत और अनावश्यक देरी के मिलना चाहिए। उनका दावा है कि लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ किसी एहसान की तरह नहीं, बल्कि उनके अधिकार के रूप में मिलना चाहिए।

प्रशांत किशोर ने अगले एक साल में बांकीपुर के करीब 10 हजार बेरोजगार या अर्ध-कुशल युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने में मदद करने का लक्ष्य भी बताया। उन्होंने स्वीकार किया कि बिहार में उद्योगों और बड़े कॉर्पोरेट संस्थानों की कमी के कारण रोजगार के कई अवसर राज्य से बाहर उपलब्ध हो सकते हैं। इसके बावजूद उनका जोर युवाओं को रोजगार के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराने पर है।

बांकीपुर के नतीजे की राजनीतिक वजहों पर बात करते हुए प्रशांत किशोर ने बीजेपी की हार के पीछे कई कारण गिनाए। उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लेकर जनता में असंतोष, बीजेपी के कथित अति आत्मविश्वास और जन सुराज के एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभरने को प्रमुख कारण बताया। हालांकि, बीजेपी की ओर से इन राजनीतिक आकलनों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।

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प्रशांत किशोर ने शराबबंदी की नीति को लेकर भी बिहार सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने मौजूदा शराबबंदी कानून को ‘फर्जी कानून’ बताते हुए नियंत्रित शराब नीति की वकालत की। उनका तर्क है कि पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद अवैध कारोबार और इससे जुड़े भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। ऐसे में सरकार को शराब के कारोबार को कानूनी और नियंत्रित व्यवस्था के तहत लाने पर विचार करना चाहिए।

बांकीपुर की जीत के बाद प्रशांत किशोर के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस राजनीतिक सफलता को व्यापक जनसमर्थन में बदलने की है। एक विधानसभा सीट की जीत से किसी नई पार्टी के लिए राज्यव्यापी राजनीतिक आधार तैयार होना आसान नहीं होता। जन सुराज को आने वाले चुनावों में अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी संगठनात्मक क्षमता और उम्मीदवारों की विश्वसनीयता साबित करनी होगी।

फिलहाल बांकीपुर का नतीजा प्रशांत किशोर और जन सुराज के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि बन चुका है। इस जीत ने बिहार की राजनीति में एक नए विकल्प की संभावना को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी है। अब देखना होगा कि क्या बांकीपुर का यह प्रयोग बिहार के दूसरे हिस्सों में भी दोहराया जा सकता है या यह जीत स्थानीय परिस्थितियों तक सीमित रहती है। प्रशांत किशोर का दावा साफ है कि अगर मतदाताओं को विश्वसनीय विकल्प मिले तो वे पुरानी राजनीतिक निष्ठाओं से बाहर निकलकर अपने मुद्दों के आधार पर फैसला कर सकते हैं।

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