New Delhi:नेपाल की बाढ़ पर उठे सवाल: प्राकृतिक आपदा या जियोइंजीनियरिंग का प्रयोग?
New Delhi: Questions raised over Nepal floods: Natural disaster or an experiment in geoengineering?
New Delhi:नेपाल में आई भीषण बाढ़ और मलबे के प्रवाह को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे सामने आ रहे हैं। कुछ लोगों ने इसे सामान्य फ्लैश फ्लड से अलग बताते हुए जियोइंजीनियरिंग या मौसम में कृत्रिम हस्तक्षेप से जोड़ने की आशंका जताई है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र और वैज्ञानिक पुष्टि अभी आवश्यक है।
आचार्य संजय तिवारी की ओर से सामने रखे गए एक विचार में सवाल उठाया गया है कि नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में दिखाई दिए गहरे रंग के मलबे और कीचड़ के प्रवाह को केवल भारी बारिश से हुई बाढ़ मानना पर्याप्त है या इसके पीछे किसी तकनीकी हस्तक्षेप की संभावना की भी जांच होनी चाहिए।
फ्लैश फ्लड और मलबे के प्रवाह में क्या अंतर?
विशेषज्ञों के अनुसार फ्लैश फ्लड में कम समय में बड़ी मात्रा में पानी तेज गति से बहता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यही पानी अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और अन्य सामग्री बहाकर अत्यधिक विनाशकारी रूप ले सकता है। ऐसी स्थिति में पानी और मलबे का मिश्रण बहुत गाढ़ा दिखाई दे सकता है।
इसी वजह से किसी बाढ़ में काला या गाढ़ा मलबा दिखाई देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह कृत्रिम रूप से पैदा की गई ‘मडफ्लड’ थी। इसके लिए प्रभावित क्षेत्र से मिट्टी, पानी और तलछट के नमूनों की वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी।
जियोइंजीनियरिंग को लेकर किए गए दावे
विचार में क्लाउड सीडिंग, HAARP तकनीक और ग्लेशियरों को कृत्रिम तरीके से पिघलाने जैसे दावों का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन तकनीकों को नेपाल की इस विशेष घटना से जोड़ने के लिए फिलहाल ठोस सार्वजनिक वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आए हैं।
क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में वर्षा को प्रभावित करने के प्रयास के तौर पर किया जाता है, लेकिन इससे किसी विशेष क्षेत्र में अत्यंत विनाशकारी बाढ़ पैदा करने का दावा अलग वैज्ञानिक जांच का विषय है। इसी तरह HAARP को मौसम को हथियार की तरह नियंत्रित करने वाली तकनीक बताने वाले दावों का भी पर्याप्त वैज्ञानिक आधार आवश्यक है।
ग्लेशियर से आने वाले मलबे की जांच महत्वपूर्ण
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, झीलें, भारी बारिश, भूस्खलन और अचानक पानी निकलने जैसी घटनाएं बड़े पैमाने पर मलबे के प्रवाह का कारण बन सकती हैं। ऐसे में नेपाल की घटना की वास्तविक वजह समझने के लिए उपग्रह तस्वीरों, मौसम संबंधी आंकड़ों, नदी के जलस्तर, ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की स्थिति तथा घटनास्थल से लिए गए नमूनों का अध्ययन महत्वपूर्ण होगा।
क्या इसे सुनियोजित हमला माना जा सकता है?
नेपाल की आपदा को किसी देश की ओर से किए गए भू-अभियांत्रिकी हमले या रणनीतिक प्रयोग के रूप में प्रस्तुत करने से पहले ठोस प्रमाण आवश्यक हैं। किसी प्राकृतिक आपदा को युद्ध जैसी कार्रवाई से जोड़ना गंभीर दावा है और इसकी पुष्टि के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक तथा सुरक्षा एजेंसियों की जांच जरूरी होगी।
सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो, बाढ़ के रंग या मलबे की तस्वीरों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं है। आपदा के वास्तविक कारणों को समझने के लिए विशेषज्ञ जांच और आधिकारिक आंकड़ों का इंतजार करना अधिक उचित होगा।
नेपाल की इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन, ग्लेशियल झीलों की निगरानी और सीमा पार जल-सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए हैं। इसलिए अटकलों के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर पूरे मामले की जांच और पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक किया जाना जरूरी है।



