सच छोटा,सनसनी बड़ी.. वाह रे रिपोर्टिंग !
पत्रकारिता में बढ़ते ‘एंगल’, सनसनी और नैरेटिव की दौड़ पर वरिष्ठ पत्रकार भास्कर दूबे का तीखा व्यंग्य। सवाल, आरोप, तथ्य और मीडिया की विश्वसनीयता पर बेबाक टिप्पणी।

भास्कर दूबे
एंगलों की आई बाढ़,सच की तलाश गई तेल लेने, अब खबर वही जो किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ हो, नारद जी आज होते तो शायद वीणा नहीं, प्रेस कार्ड फाड़ देते, “एक खबर, दस एंगल और सच का पता नहीं,” पत्रकारिता के नाम पर आरोपों की आंधी, नैरेटिव की खेती और विश्वसनीयता का संकट, अब जनता पूछ रही है, आखिर सच किसके पास है?
कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का आईना कहा जाता था। आईना इसलिए कि उसमें चेहरा जैसा होता है, वैसा ही दिखाई देता है। लेकिन आज के कुछ न्यूजरूमों ने आईने को भी ‘एंगल’ सिखा दिया है। चेहरा सामने हो तो पहले तय होता है, इसे किस कोण से दिखाना है, किस रंग में दिखाना है और कितनी बार दिखाना है!खबर सच है या नहीं, यह सवाल अब कई बार बाद में आता है। पहले सवाल होता है, “एंगल क्या है?” किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ एक खबर चली। अगले दिन उसी खबर का दूसरा एंगल। फिर तीसरे दिन नया एंगल। चौथे दिन पुराने आरोप को नई हेडलाइन। पांचवें दिन वही कहानी किसी नए ‘खुलासे’ की शक्ल में। खबर पुरानी, मसाला नया और दावा, “हमने बड़ा पर्दाफाश कर दिया”, वाह रे पत्रकारिता, अब तो लगता है कि खबर नहीं मिले तो चिंता नहीं, किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ खबर का एंगल खोजो। तथ्य आधा हो तो चलेगा, सवाल बड़ा होना चाहिए। प्रमाण छोटा हो तो चलेगा, हेडलाइन मोटी होनी चाहिए। दूसरा पक्ष मौजूद हो तो भी चलेगा, बस उसे खबर में जगह कितनी देनी है, यह संपादकीय सुविधा तय करेगी। लेकिन यहीं पत्रकारिता और प्रचार के बीच की दीवार कमजोर होने लगती है।
सवाल पूछना पत्रकारिता है,फैसला सुनाना नहीं :
पत्रकार का काम सवाल पूछना है। सरकार से भी, विपक्ष से भी, अफसर से भी, प्रभावशाली व्यक्ति से भी और अपने पेशे से भी। लेकिन सवाल और फैसला, दोनों एक चीज नहीं हैं। यदि किसी पर आरोप है तो आरोप को आरोप की तरह प्रस्तुत करना पत्रकारिता है। उसे तथ्य की तरह स्थापित कर देना, बिना पर्याप्त प्रमाण और दूसरे पक्ष की बात के, पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए गंभीर सवाल खड़ा करता है। आज समस्या यही है कि कई बार खबर अदालत से पहले फैसला सुना देती है और अगले दिन उसी फैसले के समर्थन में नया एंगल खोज लेती है। फिर जब तथ्य अलग निकलते हैं तो कहा जाता है, “हमने तो सवाल उठाया था। जनाब, सवाल उठाइए जरूर। लेकिन सवाल के नाम पर किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा का पोस्टमार्टम रोज-रोज करना कौन-सी पत्रकारिता है? सरकार भी परेशान, जनता भी हैरान
एक तरफ सरकार को वास्तविक मुद्दों की निगरानी करनी है, दूसरी तरफ मीडिया में चल रही परस्पर विरोधी खबरों की सच्चाई समझनी है। जनता की हालत तो और मजेदार है। एक चैनल कहता है, बड़ा घोटाला, दूसरा कहता है, सब सामान्य!तीसरा कहता है, इसके पीछे बड़ा राजनीतिक खेल, चौथा कहता है, हमारे पास एक्सक्लूसिव दस्तावेज।
जनता बेचारी पूछे, “भाई, सच आखिर किसके पास है?” यही भ्रम पत्रकारिता की सबसे बड़ी विडम्बना है।क्योंकि मीडिया की ताकत सरकारों को डराने में नहीं, समाज को सही सूचना देने में है। नारद जी आज होते तो शायद पूछते, ‘एंगल छोड़ो, सत्य बताओ, ’कल्पना कीजिए, देवर्षि नारद आज किसी आधुनिक न्यूजरूम में पहुंच जाएं। सामने दस स्क्रीन, पचास हेडलाइन और एक ही खबर के सात एंगल देखकर पूछें, “वत्स, सत्य क्या है?”
जवाब मिले, “महर्षि, सत्य बाद में देखेंगे, अभी ब्रेकिंग बन रही है,”नारद जी शायद वहीं वीणा रखकर कहें,“नारायण, यह तो वह पत्रकारिता नहीं है जिसे हमने संवाद समझा था, यह तो एंगल-पुराण है, ”पत्रकारिता का संकट केवल गलत खबर का नहीं, विश्वास के क्षरण का संकट है। हर पत्रकार गलत नहीं है। आज भी बड़ी संख्या में पत्रकार ईमानदारी से तथ्य जुटाते हैं, दोनों पक्ष लेते हैं और दबाव के बावजूद सच सामने रखते हैं। लेकिन कुछ लोगों की अतिरंजित और एकतरफा कार्यशैली पूरे पेशे को कठघरे में खड़ा कर देती है।आखिर खबर किसके लिए है? पत्रकारिता किसी व्यक्ति को गिराने, किसी को चढ़ाने या किसी नैरेटिव को जिताने का औजार नहीं हो सकती। उसका पहला धर्म है, सत्य, तथ्य, निष्पक्षता और जनहित।क्योंकि जिस दिन जनता ने खबर पढ़कर सबसे पहले यह सोचना शुरू कर दिया कि “देखते हैं, यह पत्रकार किसके पक्ष में है”, उस दिन खबर से पहले पत्रकार की विश्वसनीयता कटघरे में आ जाती है।
और फिर हालत वही होती है,
खबर बहुत, सत्य कम।
एंगल बहुत, प्रमाण कम।
शोर बहुत, पत्रकारिता कम।
वह भी क्या दौर है जनाब, जब पत्रकार अपनी खबर से किसी का चेहरा छिपाने पर आमादा हो और समय घूमकर ऐसा आए कि उसे खुद अपना चेहरा छिपाने की नौबत आ जाए। नारद भगवान ने भी शायद नहीं सोचा होगा कि एक दिन पत्रकारिता में खबर से ज्यादा ‘एंगल’ बिकेगा और सत्य से ज्यादा ‘नैरेटिव’।
अब भी समय है, खबर को खबर रहने दीजिए, हथियार मत बनाइए। सवाल को सवाल रहने दीजिए, फैसला मत बनाइए, और पत्रकारिता को पत्रकारिता रहने दीजिए, किसी का निजी युद्ध नहीं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



