Anant Singh: अनंत सिंह की जमानत पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, क्या फिर जाना पड़ेगा जेल?
Anant Singh: दुलारचंद यादव हत्याकांड में मिली जमानत को मृतक के पोते ने दी चुनौती, जेडीयू से छह साल के निष्कासन के बाद बढ़ीं राजनीतिक मुश्किलें।
Anant Singh: बिहार के मोकामा से विधायक अनंत सिंह के लिए शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 का दिन कानूनी रूप से अहम है। दुलारचंद यादव हत्याकांड में पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। याचिका में अनंत सिंह की जमानत रद्द कर उन्हें दोबारा जेल भेजने की मांग की गई है। हालांकि, सुनवाई से पहले यह कहना उचित नहीं होगा कि उन्हें फिर से जेल जाना ही पड़ेगा। इस पर फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निर्भर करेगा।
यह मामला 30 अक्टूबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान मोकामा क्षेत्र में दुलारचंद यादव की मौत से जुड़ा है। मृतक के पोते नीरज कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर पटना हाईकोर्ट के 19 मार्च 2026 के जमानत आदेश को चुनौती दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत में यह मामला पहले भी सूचीबद्ध हो चुका है और 29 सितंबर को सुनवाई आगे बढ़ाकर 30 अक्टूबर की तारीख तय की गई थी।
दुलारचंद यादव हत्याकांड में क्या है मामला?
दुलारचंद यादव की मौत 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मोकामा क्षेत्र में हुई थी। वह जन सुराज पार्टी से जुड़े समर्थक और पूर्व राजद नेता बताए गए थे। घटना के बाद पुलिस ने अनंत सिंह को मामले में मुख्य आरोपी के रूप में नामजद किया था। उन्हें 1 नवंबर 2025 की रात गिरफ्तार किया गया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
मामले में दुलारचंद यादव की मौत की परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए थे। शुरुआती आरोपों में गोली लगने की बात कही गई, जबकि मीडिया रिपोर्टों में पोस्टमार्टम के निष्कर्षों के आधार पर वाहन की टक्कर और गंभीर चोटों का भी उल्लेख किया गया। घटना से जुड़े आरोपों और जांच के निष्कर्षों को अंतिम न्यायिक निर्णय से अलग समझना जरूरी है। अनंत सिंह इस मामले में आरोपी हैं; आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है।
मृतक के पोते ने क्यों दी जमानत को चुनौती?
दुलारचंद यादव के पोते नीरज कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अनंत सिंह को मिली जमानत रद्द करने की मांग की है। रिपोर्टों के अनुसार, याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पटना हाईकोर्ट ने जमानत देते समय अनंत सिंह के आपराधिक इतिहास पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
इस मामले में अनंत सिंह के आपराधिक मामलों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग आंकड़े रिपोर्ट हुए हैं। कुछ रिपोर्टों में याचिका के हवाले से 67 आपराधिक मामलों का उल्लेख है, जबकि बिहार सरकार के हलफनामे के बारे में उपलब्ध सामग्री में 62 मामलों की बात कही गई है। इन संख्याओं का अंतर संबंधित अदालती दस्तावेजों से स्पष्ट किया जाना चाहिए। केवल मामलों की संख्या के आधार पर किसी आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की दलीलों, अनंत सिंह के पक्ष और राज्य सरकार के रुख पर विचार किया जा सकता है। जमानत रद्द होगी या बरकरार रहेगी, यह अदालत के आदेश से ही स्पष्ट होगा।
जेडीयू से छह साल के लिए निष्कासित हुए अनंत सिंह
कानूनी मामले के साथ अनंत सिंह की राजनीतिक मुश्किलें भी बढ़ी हैं। हाल ही में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने उन्हें और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी की ओर से यह कार्रवाई बिहार विधान परिषद के चुनाव के दौरान कथित पार्टी-विरोधी गतिविधियों को लेकर की गई।
रिपोर्टों के मुताबिक, अनंत सिंह ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जेडीयू उम्मीदवार नीरज कुमार का विरोध किया और जन सुराज से जुड़े उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया था। पार्टी ने इसे अपने निर्देशों के उल्लंघन के रूप में देखा।
जेडीयू ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता के संबंध में भी कार्रवाई की मांग की है। इस मामले में दल-बदल विरोधी प्रावधानों के तहत आगे क्या कदम उठाए जाते हैं, यह संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय पर निर्भर करेगा।
2005 में पहली बार विधायक बने थे अनंत सिंह
मोकामा की राजनीति में अनंत सिंह लंबे समय से सक्रिय हैं। वह 2005 में जेडीयू के टिकट पर पहली बार विधायक बने थे। उसी वर्ष नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने जीत दर्ज की। वर्ष 2010 में भी वह विधानसभा पहुंचे।
नीतीश कुमार से राजनीतिक मतभेदों के बाद अनंत सिंह ने 2015 का विधानसभा चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा और जीत हासिल की। वर्ष 2020 में वह राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर विधायक बने। इसके बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू के टिकट पर मोकामा से जीत दर्ज की।
उनके राजनीतिक सफर के दौरान कई आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी और जेल जाने की घटनाएं भी सामने आईं। इन मामलों में आरोप, जमानत और अदालतों के फैसलों की स्थिति अलग-अलग रही है।
पुटुस यादव हत्याकांड के बाद शुरू हुआ जेल का सिलसिला
अनंत सिंह को 2015 में पुटुस यादव हत्याकांड से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। वह जून 2015 से मार्च 2016 तक जेल में रहे। इसके बाद पटना हाईकोर्ट से उन्हें जमानत मिली थी।
अगस्त 2019 में उनके पैतृक गांव लदमा स्थित आवास से एके-47 राइफल, कारतूस और हैंड ग्रेनेड बरामद होने का मामला सामने आया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली की अदालत में आत्मसमर्पण किया। इस मामले में निचली अदालत ने जून 2022 में उन्हें 10 साल की सजा सुनाई थी। हालांकि, अगस्त 2024 में पटना हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में उन्हें इस मामले से बरी कर दिया। इसके बाद वह जेल से बाहर आए।
यहां ध्यान रखना जरूरी है कि एके-47 बरामदगी के मामले में हाईकोर्ट से मिली राहत और दुलारचंद यादव हत्याकांड में मिली जमानत दो अलग-अलग कानूनी मामले हैं।
नौरंगा-जालालपुर गोलीबारी मामले में भी हुई थी गिरफ्तारी
जनवरी 2025 में मोकामा के नौरंगा-जालालपुर इलाके में हुई गोलीबारी के मामले में भी अनंत सिंह का नाम सामने आया था। उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण किया और उन्हें न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेजा गया। अगस्त 2025 में पटना हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद वह बाहर आए।
इसके बाद अक्टूबर 2025 में दुलारचंद यादव की मौत से जुड़ा मामला सामने आया। इस प्रकरण में गिरफ्तारी के बाद वह फिर जेल गए। करीब पांच महीने न्यायिक हिरासत में रहने के बाद पटना हाईकोर्ट ने 19 मार्च 2026 को उन्हें जमानत दे दी। वह 23 मार्च को जेल से बाहर आए थे।
आज की सुनवाई से क्या तय होगा?
सुप्रीम कोर्ट में आज होने वाली सुनवाई का मुख्य सवाल अनंत सिंह को पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत को चुनौती देने वाली याचिका है। याचिकाकर्ता जमानत रद्द करने की मांग कर रहा है, जबकि अदालत को संबंधित दलीलों और रिकॉर्ड पर विचार करना होगा।
यदि सुप्रीम कोर्ट जमानत रद्द करने का आदेश देता है, तो अनंत सिंह की दोबारा हिरासत का रास्ता खुल सकता है। यदि अदालत जमानत बरकरार रखती है, तो उन्हें इस मामले में फिलहाल मिली राहत जारी रह सकती है। अदालत कोई अन्य आदेश भी दे सकती है, इसलिए सुनवाई से पहले किसी नतीजे को तय मानना सही नहीं होगा।
अनंत सिंह के सामने फिलहाल कानूनी और राजनीतिक, दोनों मोर्चों पर चुनौतियां हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और विधानसभा सदस्यता को लेकर आगे होने वाली संवैधानिक कार्रवाई से उनकी स्थिति पर असर पड़ सकता है। दोनों मामलों में अंतिम स्थिति संबंधित आधिकारिक आदेशों के बाद ही स्पष्ट होगी।



