Culture News: यादों से विमुख होता समाज! क्या हम अपनी स्मृतियाँ खो रहे हैं?
तेज़ होती आधुनिकता, डिजिटल संस्कृति और उपभोक्तावाद के दौर में क्या भारतीय समाज अपनी जड़ों, विरासत और जीवित स्मृतियों से दूर होता जा रहा है?
Culture News: जिन पुरखों के गीत गाते हम थकते नहीं, उनकी यादों को सुरक्षित रखने में हमारी दिलचस्पी कतई उत्साहजनक नहीं है। हमारे यहाँ त्योहारों पर ‘पूर्वजों का आशीर्वाद’ मांगा जाता है। शादियों में कुल-देवता को याद किया जाता है। भाषणों में Bhagat Singh, Mahatma Gandhi और Atal Bihari Vajpayee के नाम गूंजते हैं। पर जब बात आती है उन पूर्वजों की स्मृतियों, उनकी वस्तुओं और उनके संघर्षों के दस्तावेजों को सहेजने की, तब हमारी सामूहिक चेतना एकदम मौन हो जाती है। हम स्मृति-पूजक समाज से स्मृति-विरोधी समाज में बदल रहे हैं।
स्मृति-विरोध का मतलब इतिहास भूल जाना नहीं है। इतिहास किताबों में दर्ज है। स्मृति-विरोध है— जीवित यादों से रिश्ता तोड़ देना। हम इतिहास की जयंतियाँ तो मनाते हैं, पर स्मृति के स्रोत खोते जा रहे हैं।
पिछली पीढ़ी तक घरों में ‘पुश्तैनी कमरा’ होता था। उसमें पीतल के बर्तन, हाथ की चक्की, बाप-दादा की पगड़ी, शादी का जोड़ा और चिट्ठियों का पुलिंदा रखा रहता था। आज फ्लैट संस्कृति में पहला काम होता है ‘डिक्लटर’ करना। OLX पर ‘एंटीक’ बेच दिए जाते हैं। कबाड़ी वाले को रद्दी के भाव सब कुछ दे दिया जाता है और उसी रद्दी में आज़ादी के आंदोलन के पर्चे, बंटवारे के समय लिखी डायरियाँ और नेहरू-युग के राशन कार्ड भी चले जाते हैं।
भारतीय संग्रहालयों में 90 प्रतिशत सामग्री दान से नहीं, खरीद से आती है क्योंकि परिवार देना नहीं चाहते। नेशनल आर्काइव्स बार-बार कहता है— आपके पास पुराने दस्तावेज हों तो हमें दें। लेकिन आज की पीढ़ी में इसके प्रति कोई विशेष रुचि दिखाई नहीं देती।
हमारे शहर ‘विकास’ के नाम पर अपनी स्मृतियाँ मिटा रहे हैं। Delhi में हवेलियाँ तोड़कर मॉल बनाए जा रहे हैं। Lucknow के इमामबाड़ों के पीछे प्लास्टिक का कचरा है। Varanasi की गलियाँ अब ‘सेल्फी पॉइंट’ बन गई हैं। वहाँ 300 साल से रहने वाले बुनकरों का नाम कोई नहीं पूछता।
गाँवों में तालाब पट गए, पीपल के पेड़ कट गए और चौपालों पर अब मोबाइल टावर खड़े हैं। बुज़ुर्ग बताते हैं— “यहाँ फाँसी का पेड़ था, 1857 में Mangal Pandey के साथियों को लटकाया गया था।” लेकिन वहाँ अब कोई पट्टिका नहीं है। स्मृति को ज़मीन चाहिए होती है और हम वही ज़मीन बेच रहे हैं।
भारत का इतिहास काफी हद तक मौखिक रहा है— पंडवानी, बिरहा, आल्हा, लोकगीत और जनजातीय कथाएँ। YouTube आने से पहले ये दादी-नानी की गोद, खेत की मेड़ और चाय की दुकानों पर जीवित थीं। अब परिवार ‘न्यूक्लियर’ हो गए हैं। बच्चे दादा-दादी से दूर हैं। स्कूलों में प्रोजेक्ट के लिए Wikipedia काफी समझा जाता है। नतीजा यह है कि UNESCO के अनुसार 197 भारतीय भाषाएँ संकट में हैं। भाषा गई तो उसके साथ हजारों साल की कहावतें, इलाज के नुस्खे, खेती के पैटर्न और मौसम का ज्ञान भी चला जाएगा।
विडंबना देखिए, हमारे पास यादों को सहेजने के सबसे अधिक साधन आज मौजूद हैं। फोन में स्कैनर है, क्लाउड स्टोरेज है, लेकिन हम “स्टोरेज फुल” कहकर 10 साल पुराने फोटो डिलीट कर देते हैं।
‘डिजिटल डार्क एज’ आ चुका है। 2005 की CD अब नहीं चलती। Instagram की शुरुआती पोस्ट और Facebook के पुराने नोट्स गायब हो चुके हैं। हार्ड डिस्क क्रैश हुई तो तीन पीढ़ियों की शादी की एल्बम खत्म हो जाती है। हमने ‘सेव’ करना भूलकर सिर्फ ‘शेयर’ करना सीखा है।
आधुनिकता ने हमें सिखाया— आगे देखो, आगे बढ़ो, Move On। स्मृति पीछे खींचती है। कॉर्पोरेट संस्कृति कहती है— “पुरानी चीज़ों से भावुक मत हो।” यही सोच अब घरों में भी आ गई है। माँ की सिलाई मशीन “जगह घेरती है” और पिता की साइकिल “बेकार कबाड़” बन जाती है।
स्मृति बिकती नहीं, नई चीज़ बिकती है। इसलिए हर दिवाली पर “पुराना दो, नया लो” स्कीम आती है। AC, फ्रिज, फोन— सबकी उम्र तय कर दी गई है। जब वस्तुओं की उम्र ही छोटी होगी, तो उनसे जुड़ी यादों की उम्र कैसे बचेगी?
त्योहार भी अब ‘इवेंट’ बन गए हैं। पहले करवा चौथ में सास अपनी पुरानी छलनी बहू को देती थी, जिसमें चार पीढ़ियों की मेहंदी की खरोंच होती थी। अब Amazon से ‘डिज़ाइनर छलनी’ आती है। स्मृति की परंपरा टूट रही है।
स्मृति अब बोझ लगने लगी है क्योंकि हमने पहचान को एक ‘प्रोजेक्ट’ बना दिया है। Instagram पर हमें ‘कूल’ दिखना है। वहाँ बाप का हल, माँ की चर्खी और गाँव का कच्चा घर ‘एस्थेटिक’ नहीं लगता। इसलिए हम अतीत को क्रॉप कर देते हैं।
राजनीति ने भी स्मृति को हथियार बना दिया है। अब पूर्वजों को याद करना भी किसी पक्ष को चुनने जैसा माना जाने लगा है। आम आदमी चुप रहना बेहतर समझता है और यही चुप्पी धीरे-धीरे विस्मृति बन जाती है।
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1950 में हमने बांध बनाए, विस्थापन हुआ, लेकिन उससे सीखा नहीं। 2026 में स्मार्ट सिटी बना रहे हैं और फिर वही विस्थापन दोहरा रहे हैं। क्योंकि फाइलों में ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ है, ‘मानव रिपोर्ट’ नहीं।
मनोविज्ञान कहता है कि जिन परिवारों में ‘इंटरजेनेरेशनल सेल्फ’ मजबूत होती है, यानी बच्चे अपने दादा-परदादा के संघर्ष की कहानियाँ जानते हैं, वे तनाव को बेहतर ढंग से झेलते हैं। लेकिन हमने कहानी सुनाना बंद कर दिया है। इसलिए पहली असफलता पर युवा टूट जाता है। उसे पता ही नहीं कि उसके पूर्वजों ने अकाल, महामारी और बंटवारे जैसे संकट झेले थे।
जब स्मृति नहीं रहती, तो संस्कृति सिर्फ कपड़े और भोजन तक सीमित हो जाती है। योग ‘फिटनेस’ बन जाता है, आयुर्वेद ‘प्रोडक्ट’ और लोकगीत सिर्फ ‘रील का बैकग्राउंड म्यूजिक’।
स्मृति को जीवित रखना समाज का काम है। हर परिवार एक ‘स्मृति बॉक्स’ रख सकता है। उसमें पुरानी तस्वीरें, चिट्ठियाँ, बर्तन, रिपोर्ट कार्ड और पहली नौकरी की सैलरी स्लिप जैसी चीज़ें रखी जा सकती हैं। हर साल परिवार साथ बैठकर उन्हें देखे और बच्चों को उनसे जुड़ी कहानियाँ सुनाए।
कुतुब मीनार ईंटों से नहीं, समय से बनी है। ताजमहल सिर्फ संगमरमर नहीं, एक स्मृति है। जिस दिन हम यादों को “बेकार का कबाड़” समझने लगेंगे, उस दिन हम इमारतें तो बना लेंगे, लेकिन तहज़ीब नहीं बचा पाएँगे।
स्मृति-विरोधी समाज तेज़ भाग सकता है, लेकिन दूर नहीं जा सकता। क्योंकि जिसे यह नहीं पता कि वह कहाँ से चला था, वह यह भी तय नहीं कर पाएगा कि उसे जाना कहाँ है।
तो अगली बार जब घर की सफाई करें, एक बार रुककर खुद से पूछिए— क्या मैं सिर्फ सामान फेंक रहा हूँ, या अपनी कहानी का एक पन्ना भी फाड़ रहा हूँ?
(लेखक विचारक एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं।)


