Green Energy: किशाऊ परियोजना पर 6 राज्यों की सहमति, 15 हजार करोड़ के बांध से बदलेगी यमुना की तस्वीर
Green Energy: जल बंटवारे पर बनी सहमति के बाद किशाऊ परियोजना को मिली नई गति, पानी, बिजली और बाढ़ नियंत्रण में दिखेगा बड़ा असर
Green Energy: देश के छह राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे जल बंटवारे के विवाद को सुलझाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। करीब 15 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना से उत्तर भारत के कई राज्यों को पानी, बिजली और सिंचाई की सुविधा मिलने की उम्मीद है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होंगे। इससे वर्षों से अटकी परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है।
क्या है किशाऊ परियोजना?
किशाऊ बांध उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदी मानी जाती है। परियोजना के तहत 232.6 मीटर ऊंचा बांध बनाया जाएगा, जो निर्माण पूरा होने पर एशिया के सबसे ऊंचे बांधों में शामिल होगा।
इस परियोजना से 660 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन की क्षमता विकसित होगी। साथ ही बड़े पैमाने पर जल भंडारण, पेयजल आपूर्ति और सिंचाई की सुविधाएं भी बढ़ेंगी।
किस राज्य को कितना पानी मिलेगा?
प्रस्तावित जल वितरण के अनुसार हरियाणा को सबसे अधिक 836 क्यूसेक पानी मिलेगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी आवंटित किया जाएगा।
विशेष बात यह है कि हिमाचल प्रदेश के हिस्से के पानी का उपयोग दिल्ली और राजस्थान भी कर सकेंगे। इसके बदले दोनों राज्य बिजली परियोजना की लागत में योगदान देंगे।
बिजली उत्पादन से किसे होगा फायदा?
परियोजना से हर वर्ष लगभग 1,379 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान है। इस बिजली का लाभ मुख्य रूप से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को मिलेगा। दोनों राज्यों के बीच बिजली का वितरण बराबर हिस्सेदारी के आधार पर किया जाएगा।
यमुना और बाढ़ नियंत्रण को मिलेगा लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि किशाऊ परियोजना से यमुना नदी में सालभर जल प्रवाह बनाए रखने में मदद मिलेगी। इससे नदी के पुनर्जीवन और सफाई अभियानों को मजबूती मिल सकती है। वहीं मानसून के दौरान अतिरिक्त पानी को नियंत्रित कर बाढ़ की स्थिति को कम करने में भी सहायता मिलेगी।
छह दशक बाद क्यों बनी सहमति?
किशाऊ परियोजना की अवधारणा करीब 60 वर्ष पहले सामने आई थी। हालांकि लागत, जल बंटवारे, तकनीकी पहलुओं और राज्यों की हिस्सेदारी जैसे मुद्दों के कारण यह योजना लगातार अटकी रही। वर्ष 2008 में इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा भी मिला, लेकिन राज्यों के बीच पूर्ण सहमति नहीं बन सकी थी।
अब छह राज्यों के बीच प्रस्तावित समझौते के बाद परियोजना के निर्माण कार्य में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
परियोजना की प्रमुख बातें
- लागत: लगभग 15,000 करोड़ रुपये
- बांध की ऊंचाई: 232.6 मीटर
- बिजली उत्पादन क्षमता: 660 मेगावाट
- वार्षिक बिजली उत्पादन: 1,379 मिलियन यूनिट
- जल भंडारण क्षमता: 1561.91 मिलियन घन मीटर
- लाभार्थी राज्य: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान
किशाऊ परियोजना केवल एक बांध परियोजना नहीं, बल्कि उत्तर भारत में जल प्रबंधन, बिजली उत्पादन और अंतरराज्यीय सहयोग का बड़ा मॉडल बन सकती है। यदि समझौते के बाद निर्माण कार्य तय समय पर आगे बढ़ता है, तो इसका लाभ करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है।



