Aurangzeb history: न दिल्ली, न औरंगाबाद… औरंगज़ेब की कब्र खुल्दाबाद में क्यों?

Aurangzeb history: मुगल सम्राट औरंगज़ेब, जिनका शासन भारतीय इतिहास में सबसे लंबे समय तक चला, उनकी कब्र किसी भव्य मकबरे में नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के एक छोटे से कस्बे खुल्दाबाद में है। आखिर क्यों? औरंगज़ेब ने अपने जीवन के आखिरी 27 साल दक्षिण भारत में मराठाओं के खिलाफ युद्ध करते हुए बिताए। उनकी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उन्हें सूफी संत ज़ैनुद्दीन शिराज़ी की दरगाह के पास दफनाया जाए। 1707 में उनकी मृत्यु के बाद, उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उन्हें खुल्दाबाद में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। दिलचस्प बात यह है कि जहां बाकी मुगल शासकों की कब्रें भव्य हैं, वहीं औरंगज़ेब की कब्र बेहद साधारण है। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जीविका के लिए खुद टोपी सिलकर पैसे कमाए और उन्हीं पैसों से अपनी कब्र बनवाई। उनकी यह सादगी और धार्मिक निष्ठा ही खुल्दाबाद को उनका अंतिम निवास स्थान बना गई।

औरंगज़ेब की कब्र का खुल्दाबाद में होना एक दिलचस्प और अर्थपूर्ण घटना है। उनकी कब्र की सादगी और धार्मिक निष्ठा उनकी ज़िंदगी के असल दर्शन को प्रकट करती है। औरंगज़ेब ने सत्ता और ऐश्वर्य की बजाय साधारणता और धार्मिकता को प्राथमिकता दी। उनके जीवन के अंतिम वर्षों में, जब वे मराठाओं से जूझ रहे थे, तब उनकी मानसिकता और उनकी प्राथमिकताएँ साफ़ दिखाई देती हैं।

उनकी इच्छा के अनुसार, खुल्दाबाद में दफनाया जाना एक आध्यात्मिक और सरल जीवन का प्रतीक है। यह उनके राजनीतिक और व्यक्तिगत दृष्टिकोण से भी जुड़ा था, जिसमें उन्होंने भव्यता और शाही ठाठ-बाठ को नकारा और साधारणता को अपनाया।

खुल्दाबाद के लिए यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूफी संत ज़ैनुद्दीन शिराज़ी की दरगाह के पास स्थित है, जिन्हें औरंगज़ेब सम्मान देते थे। इस स्थान का चयन उनके धार्मिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहां वे अंतिम विश्राम में सूफी साधु की मौजूदगी में रहना चाहते थे।

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यह घटना यह भी दर्शाती है कि औरंगज़ेब ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में भव्यता और ऐश्वर्य से दूर रहते हुए, अपनी निष्ठा और साधारण जीवन को महत्व दिया।

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