UP Politics : ‘योगी-अखिलेश-मायावती, किरदार तीन और कुर्सी एक’, जुबानी जंग ने बढ़ाई तपिश

UP Politics : यूपी चुनाव 2027 को लेकर योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव और मायावती के बीच सियासी जंग तेज हो गई है। जानिए तीनों नेताओं की रणनीति, पीडीए और वोट बैंक का चुनावी गणित।

अनिल भारद्वाज

UP Politics : उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का रण अभी दूर है, लेकिन उसकी तपिश अब सड़कों से लेकर मंचों तक महसूस होने लगी है। प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से भाजपा बनाम सपा की सीधी भिड़ंत दिखाई देती रही थी, लेकिन अब बसपा प्रमुख मायावती ने भी अपने तेवर तेज कर दिए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और मायावती के बीच शुरू हुआ यह त्रिकोणीय वाक्युद्ध महज आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि 2027 के लिए वोटों की जमीन तैयार करने की कवायद माना जा रहा है।

योगी ने अखिलेश को निशाने पर लेकर सपा शासन की पुरानी तस्वीर सामने रख दी। अंबेडकरनगर के मंच से उन्होंने सपा सरकार को कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर घेरते हुए कहा कि उस दौर में थाने-तहसील पर कब्जे की शिकायतें आम थीं और सपा के झंडे वाली गाड़ी देखकर लोग डरते थे। दंगे और कर्फ्यू को लेकर भी उन्होंने सपा पर हमला बोला। अखिलेश का नाम लिए बिना ‘बबुआ’ पर तंज कसते हुए योगी ने उनकी दिनचर्या तक को राजनीतिक हथियार बना दिया। उनका संदेश साफ था, 2027 में चुनाव सिर्फ सरकार के काम पर नहीं, बल्कि भाजपा बनाम सपा के पुराने शासन के रिकॉर्ड पर भी लड़ा जाएगा।

योगी का सबसे आक्रामक तेवर उस वक्त दिखा जब उन्होंने दंगा कराने की धमकी देने वालों को चेताते हुए कहा कि उनके सामने दो ही रास्ते हैं, जेल या जहन्नुम। यह बयान भाजपा के उस नैरेटिव को मजबूत करता है जिसमें योगी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि कानून-व्यवस्था को बताया जाता है।

अखिलेश यादव ने पलटवार किया तो निशाना सीधे योगी सरकार की राजनीतिक ब्रांडिंग पर था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का प्रचार तंत्र रोज करोड़ों रुपये खर्च कर अपनी छवि चमकाने में जुटा है, लेकिन यही प्रचार तंत्र उसके अंत का कारण बनेगा। राम मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितता, बुलडोजर कार्रवाई और कथित फर्जी एनकाउंटर जैसे मुद्दों को गिनाते हुए अखिलेश ने योगी सरकार को घेरने की कोशिश की। उनका निशाना सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि उसके उस नैरेटिव पर है जिसके सहारे भाजपा 2027 में दोबारा सत्ता हासिल करने की जमीन तैयार कर रही है।

लेकिन इस दोतरफा वार में मायावती ने तीसरा मोर्चा खोल दिया है। उनका निशाना इस बार भाजपा से ज्यादा अखिलेश यादव और सपा की बदलती सामाजिक रणनीति पर रहा। सपा के ब्राह्मण आउटरीच और पीडीए की नई व्याख्या को लेकर मायावती ने अखिलेश पर हमला बोलते हुए सपा को ‘गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली’ पार्टी बताया। उनका तर्क है कि जिस ‘पी’ को पहले पिछड़ा बताया जाता था, अब पंडित बताया जा रहा है। यानी बसपा ने संकेत दे दिया है कि वह 2027 में दलित-ब्राह्मण और बहुजन सामाजिक समीकरण को फिर से अपनी राजनीतिक जमीन बनाने के लिए इस्तेमाल करेगी।

यहीं से मुकाबला दिलचस्प हो जाता है। योगी का लक्ष्य सत्ता विरोधी लहर को रोकना और सपा को मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनाए रखना है। अखिलेश की कोशिश भाजपा विरोधी वोटों को अपने पक्ष में समेटने की है। वहीं मायावती चाहती हैं कि भाजपा और सपा के बीच ध्रुवीकृत मुकाबले में बसपा का बहुजन आधार फिर से निर्णायक भूमिका में लौटे।

एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध की कोशिश गति पकड़ चुकी है। तीनों नेताओं के हालिया बयानों में एक साझा संकेत दिखाई देता है कि 2027 की लड़ाई केवल सीटों की नहीं, सामाजिक समीकरणों की भी होगी। भाजपा कानून-व्यवस्था और विकास के मुद्दे पर सपा को घेर रही है। सपा पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों को जोड़ने के साथ ब्राह्मणों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। बसपा इस पूरी कवायद को अपने पारंपरिक दलित आधार और व्यापक बहुजन राजनीति के लिए चुनौती के रूप में देख रही है।

इसलिए तीनों की जुबान जितनी तल्ख हो रही है, उसके पीछे उतना ही बड़ा चुनावी गणित छिपा है। योगी का हमला अखिलेश पर, अखिलेश का निशाना योगी पर और मायावती की चोट अखिलेश के पीडीए पर, लेकिन असली निशाना 2027 का वोट बैंक है। फिलहाल यह सिर्फ जुबानी जंग का ट्रेलर है। चुनावी मैदान सजने के साथ इसमें मुद्दे बदलेंगे, हमले और व्यक्तिगत होंगे और जातीय-सामाजिक समीकरणों की व्याख्या भी नई-नई होगी। 2027 की सियासी पटकथा लिखी जा रही है। किरदार तीन हैं, लेकिन कुर्सी एक।

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