Lifestyle Update: पद्मश्री यानुंग जामोह लेगो कौन हैं? जानिए हर्बल चिकित्सा से जुड़ी उनकी प्रेरक कहानी
पारंपरिक औषधीय पौधों के संरक्षण और हर्बल चिकित्सा में योगदान के लिए मिला पद्मश्री सम्मान
Lifestyle Update: अरुणाचल प्रदेश की प्रसिद्ध पारंपरिक हर्बल चिकित्सक यानुंग जामोह लेगो ने दशकों से पारंपरिक औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों के ज्ञान को संरक्षित करने और लोगों तक पहुंचाने का कार्य किया है। उनके इसी योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2024 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। बताया जाता है कि उन्होंने अपने लंबे कार्यकाल में तीन लाख से अधिक लोगों को पारंपरिक चिकित्सा के माध्यम से परामर्श और उपचार उपलब्ध कराया है।
पिता से विरासत में मिला जड़ी-बूटियों का ज्ञान
यानुंग जामोह लेगो का जन्म 9 जुलाई 1963 को अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी सियांग जिले के सिका टोडे गांव में हुआ। उनके पिता एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोक चिकित्सक थे, जिनसे उन्होंने बचपन से ही औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों की पहचान तथा उपयोग सीखा।
उन्होंने असम कृषि विश्वविद्यालय से कृषि शिक्षा प्राप्त की और 1988 में अरुणाचल प्रदेश के कृषि विभाग में नौकरी शुरू की। वर्ष 2023 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे पारंपरिक चिकित्सा और औषधीय पौधों के संरक्षण के कार्य में सक्रिय हैं।
लाखों लोगों तक पहुंचाया पारंपरिक चिकित्सा का लाभ
यानुंग जामोह लेगो का दावा है कि उन्होंने अब तक तीन लाख से अधिक लोगों को पारंपरिक जड़ी-बूटियों के माध्यम से उपचार और स्वास्थ्य संबंधी सलाह दी है। उनके पास कैंसर, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर सहित कई बीमारियों से पीड़ित लोग भी पहुंचते रहे हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए आधुनिक चिकित्सा पद्धति, विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित इलाज सबसे महत्वपूर्ण हैं। पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग केवल चिकित्सकीय सलाह के साथ सहायक रूप में ही किया जाना चाहिए।
औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए बनाई संस्था
वर्ष 2009 में यानुंग जामोह लेगो ने “Indigenous Herbal Heritage” नामक संस्था की स्थापना की। इसका उद्देश्य पारंपरिक औषधीय पौधों का संरक्षण, उनकी खेती को बढ़ावा देना और लोगों को हर्बल चिकित्सा के प्रति जागरूक करना है।
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संस्था के माध्यम से हजारों लोगों को औषधीय पौधों के महत्व की जानकारी दी गई है तथा हर वर्ष बड़ी संख्या में औषधीय पौधों का रोपण भी किया जाता है।
कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित
पारंपरिक चिकित्सा और हर्बल ज्ञान के संरक्षण में योगदान के लिए यानुंग जामोह लेगो को वर्ष 2024 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इससे पहले उन्हें अरुणाचल प्रदेश राज्य पुरस्कार (2019), सृष्टि सम्मान (2007) और पारंपरिक वैद्य रत्न पुरस्कार (2013) सहित कई सम्मान मिल चुके हैं।
पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा का संतुलन जरूरी
यानुंग जामोह लेगो की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि भारत की पारंपरिक औषधीय विरासत आज भी शोध और संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कैंसर या अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए केवल जड़ी-बूटियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। किसी भी प्रकार की वैकल्पिक चिकित्सा अपनाने से पहले योग्य डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है।



