Pakistan 6 Front War: भारत से लेकर बलूचिस्तान और ईरान तक, छह मोर्चों पर क्यों फंसा पाकिस्तान?
Saudi-Turkey-Pakistan Defence Deal के बीच बढ़ी चुनौतियां, बलूचिस्तान, POK, KPK और अफगानिस्तान बने बड़ी परेशानी
Pakistan 6 Front War: पाकिस्तान इस समय एक साथ कई मोर्चों पर बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक तरफ भारत के साथ उसका तनाव लगातार बना हुआ है, तो दूसरी ओर बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दे उसकी आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इसके अलावा ईरान और मध्य-पूर्व में सक्रिय ईरान समर्थित समूहों से जुड़े संभावित तनाव ने भी इस्लामाबाद की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसी बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ ‘मक्का रक्षा समझौता’ किया है, जिसे क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में अहम कदम माना जा रहा है।
इस समझौते के बाद पाकिस्तान को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या सऊदी अरब और तुर्की का साथ उसकी सुरक्षा चुनौतियों को कम कर पाएगा। जानकारों के हवाले से सामने आई चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान के सामने घरेलू और बाहरी चुनौतियों का ऐसा जटिल जाल है, जिसे केवल किसी रक्षा समझौते के जरिए सुलझाना आसान नहीं होगा।
पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती उसके पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी इलाकों में दिखाई देती है। बलूचिस्तान लंबे समय से हिंसा और अलगाववादी गतिविधियों से जूझ रहा है। बलूच विद्रोही संगठन पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा बलों के खिलाफ लगातार हमले करते रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध इस क्षेत्र में राजनीतिक असंतोष, आर्थिक शिकायतों और सुरक्षा संकट ने हालात को और जटिल बना दिया है।
दूसरी तरफ खैबर पख्तूनख्वा में भी आतंकवाद और उग्रवाद पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। अफगानिस्तान से लगी सीमा के कारण इस इलाके में सुरक्षा स्थिति हमेशा संवेदनशील रही है। पाकिस्तान और अफगान तालिबान सरकार के बीच भी कई मुद्दों पर तनाव देखने को मिलता रहा है। सीमा पार आतंकवाद के आरोप और सीमा विवाद दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करते हैं।
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी POK भी इस्लामाबाद के लिए राजनीतिक और सुरक्षा चुनौती बनता जा रहा है। वहां समय-समय पर महंगाई, बेरोजगारी, बिजली, प्रशासन और राजनीतिक अधिकारों को लेकर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। ऐसे आंदोलनों ने पाकिस्तान सरकार के सामने यह सवाल खड़ा किया है कि वह अपने नियंत्रण वाले इस क्षेत्र में असंतोष को किस तरह संभालेगी।
इन तीन आंतरिक मोर्चों के अलावा भारत पाकिस्तान के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाहरी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है। पिछले साल मई में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव के दौरान भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था। भारत का कहना था कि यह कार्रवाई आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए की गई थी। इसके बाद पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं और एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर भी कई दावे सामने आए।
हालांकि, भारत-पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई से जुड़े नुकसान और विमानों की संख्या को लेकर दोनों देशों के दावे अलग-अलग रहे हैं। इसलिए युद्ध के दौरान हुए नुकसान के संबंध में सामने आए सभी आंकड़ों को आधिकारिक पुष्टि के बिना अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि उस टकराव के बाद दोनों देशों के बीच रणनीतिक और सैन्य तनाव और गहरा हुआ है।
इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान का सऊदी अरब और तुर्की के साथ रक्षा सहयोग महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ‘मक्का रक्षा समझौते’ को व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान के लिए यह समझौता इसलिए अहम है क्योंकि उसे इससे आर्थिक और सैन्य स्तर पर सहयोग की उम्मीद हो सकती है।
सऊदी अरब के लिए ईरान और हूती जैसे क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं, जबकि तुर्की NATO का सदस्य है और उसके पास अपनी मजबूत सैन्य क्षमताएं हैं। ऐसे में तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
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लेकिन सवाल यह है कि क्या बाहरी सैन्य समर्थन पाकिस्तान की आंतरिक समस्याओं का समाधान कर सकता है? इसका जवाब इतना आसान नहीं है। किसी भी देश की सुरक्षा केवल हथियारों और रक्षा समझौतों पर निर्भर नहीं करती। राजनीतिक स्थिरता, मजबूत अर्थव्यवस्था, प्रभावी प्रशासन और जनता का भरोसा भी उतना ही जरूरी होता है।
पाकिस्तान पहले से आर्थिक दबाव, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता रहा है। ऐसे में अगर एक साथ कई इलाकों में हिंसा या असंतोष बढ़ता है तो सेना और सुरक्षा बलों पर दबाव भी बढ़ सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती बाहरी दुश्मनों से ज्यादा अपने अंदरूनी संकटों को नियंत्रित करना हो सकती है।
भारत की तरफ से भी तुर्की के साथ पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी को लेकर रणनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। भारत ने ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया जैसे देशों के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं। वहीं इजरायल के साथ भारत के रक्षा और तकनीकी संबंध भी लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। इससे दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व के बीच सुरक्षा समीकरण और जटिल हो जाते हैं।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान के ‘टूटने’ या कई हिस्सों में बंटने की स्थिति तय है। ऐसे दावे राजनीतिक और रणनीतिक विश्लेषण का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन किसी देश के भविष्य को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। पाकिस्तान के सामने गंभीर चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन उसके पास एक मजबूत सैन्य ढांचा, परमाणु क्षमता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के रास्ते भी मौजूद हैं।
इसलिए आने वाले समय में असली परीक्षा पाकिस्तान की यह होगी कि वह अपने आंतरिक असंतोष, आतंकवाद, आर्थिक दबाव और पड़ोसी देशों के साथ तनाव को किस तरह संभालता है। सऊदी अरब और तुर्की का समर्थन उसे रणनीतिक ताकत दे सकता है, लेकिन घरेलू समस्याओं का स्थायी समाधान पाकिस्तान को खुद ही तलाशना होगा।



