Uranium : भारत के लिए क्यों अहम है ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम? जानिए परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और 2047 के लक्ष्य से इसका कनेक्शन
Uranium : ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम भारत के लिए क्यों अहम है? जानिए परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा, 2047 तक 100 GW लक्ष्य और भारत-ऑस्ट्रेलिया परमाणु सहयोग का पूरा विश्लेषण।
Uranium : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों ने ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की भारत को आपूर्ति आसान बनाने के लिए जरूरी परिचालन व्यवस्था (Operational Arrangement) को अंतिम रूप दिया है। यह फैसला केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और दीर्घकालिक परमाणु कार्यक्रम के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या होता है यूरेनियम?
यूरेनियम एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी धातु है, जिसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में ईंधन के रूप में किया जाता है। परमाणु रिएक्टर में नियंत्रित नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है। इसी ऊर्जा से भाप बनती है, टर्बाइन चलते हैं और बिजली का उत्पादन होता है।
परमाणु ऊर्जा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन के बावजूद कार्बन उत्सर्जन बहुत कम होता है। इसलिए इसे स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही देश जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है। केंद्र सरकार ने 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जबकि वर्तमान क्षमता लगभग 8.8 गीगावॉट है।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए परमाणु ईंधन की लगातार उपलब्धता जरूरी होगी। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्तिकर्ता बन सकता है।
ऑस्ट्रेलिया की क्या है खासियत?
ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम संसाधनों वाले देशों में शामिल है। उसके पास वैश्विक ज्ञात यूरेनियम भंडार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा मौजूद है। यही वजह है कि भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया भविष्य में परमाणु ईंधन का एक रणनीतिक और विश्वसनीय साझेदार बन सकता है।
क्या है भारत-ऑस्ट्रेलिया परमाणु समझौता?
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 2014 में नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद दोनों देशों ने कई तकनीकी और नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी कीं।
अब जिस ऑपरेशनल अरेंजमेंट को अंतिम रूप दिया गया है, उससे ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम निर्यात की प्रक्रिया अधिक सरल, व्यवस्थित और प्रभावी होगी।
केवल शांतिपूर्ण उपयोग के लिए होगा यूरेनियम
ऑस्ट्रेलिया की स्पष्ट नीति है कि उसका यूरेनियम केवल शांतिपूर्ण और गैर-सैन्य उद्देश्यों के लिए ही निर्यात किया जाएगा। इस पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा मानकों और द्विपक्षीय निगरानी व्यवस्था लागू रहेगी। भारत भी अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम के तहत इन सभी नियमों का पालन करता है।
भारत को क्या होंगे फायदे?
- ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति से भारत को कई रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं।
- परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए ईंधन की स्थिर आपूर्ति।
- ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती।
- कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता में कमी।
- स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में तेजी।
- 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा लक्ष्य हासिल करने में मदद।
- भारत-ऑस्ट्रेलिया रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।
ऑस्ट्रेलिया को क्या मिलेगा?
यह समझौता ऑस्ट्रेलिया के लिए भी आर्थिक और रणनीतिक रूप से फायदेमंद है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसकी ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया को अपने यूरेनियम और अन्य खनिज संसाधनों के लिए बड़ा और स्थायी बाजार मिलेगा।
भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम सहयोग केवल परमाणु ईंधन की आपूर्ति तक सीमित नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, जलवायु लक्ष्यों और 2047 तक विकसित भारत के विजन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया के लिए यह एशिया के सबसे बड़े ऊर्जा बाजारों में अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करने का अवसर भी है। इस लिहाज से यह समझौता दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई देने वाला माना जा रहा है।



