पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण कानून में बड़ा बदलाव, 77 मुस्लिम समुदाय सूची से बाहर, विधानसभा में विधेयक पारित

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण व्यवस्था में व्यापक बदलाव करते हुए दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों को मंजूरी दे दी है। विधानसभा में इन विधेयकों को भारी बहुमत से पारित किया गया। सरकार का कहना है कि यह कदम कलकत्ता हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद आरक्षण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और तथ्य आधारित बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

इन संशोधनों के बाद OBC वर्गीकरण और समुदायों की पहचान से जुड़ी प्रक्रिया में कई अहम बदलाव किए गए हैं।

77 मुस्लिम समुदायों को OBC सूची से हटाया गया

नए संशोधनों के तहत 77 मुस्लिम समुदायों को OBC सूची से बाहर कर दिया गया है। इनमें मुस्लिम नेहरिया, मुस्लिम हलदार, मुस्लिम माली, घोसी (मुस्लिम), मुस्लिम दर्जी, इदरीसी, मुस्लिम राजमिस्त्री और मुस्लिम मोल्ला जैसे समुदाय शामिल हैं।

हालांकि सभी मुस्लिम समुदायों को सूची से नहीं हटाया गया है। कुछ समुदायों का OBC दर्जा बरकरार रखा गया है, जिनमें जुलाहा (अंसारी मोमिन), फकीर, पहाड़िया मुस्लिम, हज्जाम (मुस्लिम) और चौदुली (मुस्लिम) शामिल हैं।

आरक्षण व्यवस्था में किया गया पुनर्गठन

राज्य सरकार के अनुसार, संशोधन के दौरान उन 113 श्रेणियों को हटाया गया है जिन्हें पहले बिना विस्तृत क्षेत्रीय सर्वेक्षण के OBC सूची में शामिल किया गया था। वहीं, 66 उप-श्रेणियों को बरकरार रखा गया है, जिनके समर्थन में सर्वेक्षण आधारित आंकड़े उपलब्ध थे।

सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य आरक्षण नीति को अधिक वैज्ञानिक और प्रमाण आधारित बनाना है।

पिछड़ा वर्ग आयोग को मिले अधिक अधिकार

संशोधित कानून के तहत पिछड़ा वर्ग आयोग (Backward Classes Commission) की भूमिका को और मजबूत किया गया है। अब आयोग को भविष्य में किसी भी समुदाय को OBC सूची में शामिल करने या बाहर करने के प्रस्तावों की समीक्षा करने का अधिकार होगा।

इसके अलावा आयोग विभिन्न OBC श्रेणियों के लिए आरक्षण प्रतिशत को लेकर भी राज्य सरकार को सुझाव दे सकेगा।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद आया बदलाव

इन संशोधनों की पृष्ठभूमि में कलकत्ता हाईकोर्ट का मई 2024 का वह फैसला है, जिसमें OBC वर्गीकरण की पूर्व प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने उस समय समुदायों को OBC सूची में शामिल करने की प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जताई थी।

सरकार का कहना है कि नया कानून न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित प्रणाली स्थापित करने का प्रयास है।

विपक्ष ने उठाए सवाल

विधेयक को लेकर विपक्षी दलों ने अपनी आपत्तियां भी दर्ज कराई हैं। इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि कुछ विशेष समुदायों को निशाना बनाकर सूची से बाहर किया गया है।

उन्होंने कहा कि आरक्षण से जुड़े फैसले राजनीतिक आधार पर नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के आधार पर होने चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी बदलाव को विश्वसनीय आंकड़ों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए।

आगे भी जारी रह सकती है बहस

पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण व्यवस्था से जुड़े ये बदलाव सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गए हैं। एक ओर सरकार इसे न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप सुधारात्मक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसकी प्रक्रिया और प्रभावों पर सवाल उठा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में पिछड़ा वर्ग आयोग की नई भूमिका और समुदायों के वर्गीकरण की प्रक्रिया पर व्यापक बहस देखने को मिल सकती है।

सामाजिक न्याय की बहस के केंद्र में नया कानून

OBC संशोधन विधेयक के पारित होने के बाद पश्चिम बंगाल में आरक्षण नीति को लेकर नया अध्याय शुरू हो गया है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई व्यवस्था का विभिन्न समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ता है और भविष्य में आरक्षण से जुड़ी मांगों तथा विवादों को किस तरह संबोधित किया जाता है।

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